जब सच कटघरे में खड़ा किया गया, तब सुप्रीम कोर्ट बना ढाल

Freelance editor Amardeep chauhan @ amarkhabar.com
Delhi.लोकतंत्र में सबसे असहज करने वाली आवाज़ अगर किसी को लगती है, तो वह है—सच बोलने वाले पत्रकार की आवाज़। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने इसी आवाज़ के पक्ष में खड़े होकर एक ऐसा संदेश दिया है, जो सिर्फ पत्रकारों के लिए नहीं, बल्कि हर जागरूक नागरिक के लिए राहत की सांस जैसा है।
मामला Writ Petition (Cr.) No. 402/2024, दिनांक 4 अक्टूबर 2024 का है। एक पत्रकार ने व्यवस्था की खामियों पर सवाल उठाए, दस्तावेज़ों और तथ्यों के आधार पर रिपोर्ट लिखी। जवाब में सिस्टम ने आत्ममंथन करने के बजाय आसान रास्ता चुना—FIR।
यानी सवाल सच का नहीं था, सवाल पूछने वाले का था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रवृत्ति को साफ शब्दों में खारिज किया। अदालत ने कहा कि FIR को डराने और दबाने का औज़ार नहीं बनने दिया जा सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कोई अपराध नहीं है, और न ही पत्रकारिता कोई साज़िश।
यह टिप्पणी महज़ कानूनी आदेश नहीं, बल्कि लोकतंत्र के पक्ष में एक सख़्त चेतावनी है।
चौथा स्तंभ क्यों ज़रूरी है?
संविधान ने देश को तीन नहीं, चार मज़बूत खंभों पर खड़ा किया है—
विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया।
मीडिया वह आईना है, जिसमें सत्ता अपना असली चेहरा देखती है। यही कारण है कि जब यह आईना सच दिखाता है, तो उसे तोड़ने की कोशिशें होती हैं।
अगर पत्रकार चुप करा दिए जाएँ, तो
भ्रष्टाचार फाइलों में दफन हो जाएगा
गरीब और आम आदमी की आवाज़ कहीं दर्ज नहीं होगी
अफसरशाही और सत्ता बेलगाम हो जाएगी
आज जो माहौल बन रहा है, वह चिंताजनक है। सच लिखने पर मुकदमे, सवाल पूछने पर धमकियाँ और घोटाले उजागर करने पर कानूनी शिकंजा—यह लोकतंत्र का स्वभाव नहीं, बल्कि उसकी बीमारी के लक्षण हैं।
सुप्रीम कोर्ट का साफ संदेश
अदालत ने स्पष्ट कर दिया है—
FIR डराने का हथियार नहीं है
असहमति देशद्रोह नहीं होती
पत्रकारों को कानून के नाम पर खामोश नहीं किया जा सकता
यह फैसला सिर्फ मीडिया के लिए नहीं, बल्कि हर उस नागरिक के अधिकारों की रक्षा करता है जो सवाल पूछने की हिम्मत रखता है।
जनता से सीधी अपील
आज अगर पत्रकार को अकेला छोड़ दिया गया, तो कल वही चुप्पी आपकी आवाज़ तक पहुँच जाएगी। इसलिए ज़रूरी है कि—
सच्ची पत्रकारिता के साथ खड़े हों
फर्जी और बदले की कार्रवाई का विरोध करें
सच बोलने वालों की हिफाज़त करें
याद रखिए—
जिस देश में पत्रकार डर जाएँ,
वहाँ जनता धीरे-धीरे मौन कैदी बन जाती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भरोसा दिलाया है कि अभी न्याय ज़िंदा है, सच ज़िंदा है—और जब तक सवाल ज़िंदा हैं, तब तक लोकतंत्र भी ज़िंदा रहेगा।