राजस्थान पुलिस के लिए नई चुनौती-
अपराधियों की ‘निजता’ बनाम जनता की ‘सुरक्षा’: हाई कोर्ट के ‘फोटो बैन’ आदेश से पुलिस के हाथ-पांव फूले, अपराध जगत में ‘गुमनामी’ की लहर!
Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा गिरफ्तार आरोपियों की फोटो सार्वजनिक करने पर लगाई गई पूर्ण रोक ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था और पुलिसिंग के तौर-तरीकों पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ा कर दिया है। जस्टिस फरजंद अली की एकल पीठ द्वारा ‘मानवीय गरिमा’ और ‘अनुच्छेद 21’ का हवाला देते हुए दिए गए इस आदेश के बाद, पुलिस महकमे में इस बात को लेकर भारी चिंता है कि अब खतरनाक गिरोहों और नशा तस्करों पर नकेल कैसे कसी जाएगी।
क्यों छिड़ी है बहस?
कोर्ट का मानना है कि किसी को महज ‘आरोपी’ होने पर समाज में अपमानित करना उसकी प्रतिष्ठा को स्थायी रूप से खत्म कर देता है। लेकिन पुलिस अधिकारियों और कानूनी जानकारों का एक वर्ग इसे ‘अपराधियों के लिए कवच’ मान रहा है। जानकारों का कहना है कि जब एक लुटेरे या ठग का चेहरा अखबार में छपता है, तो वह केवल खबर नहीं, बल्कि लाखों नागरिकों के लिए एक ‘अलर्ट’ होता है।
पुलिस प्रशासन के सामने पहाड़ जैसी चुनौतियां:
इंटर-स्टेट गैंग्स को मिलेगा ‘गुमनामी’ का फायदा: राजस्थान में अक्सर हरियाणा, यूपी और दिल्ली के गैंग सक्रिय रहते हैं। फोटो जारी होने से दूसरे राज्यों की पुलिस आरोपियों को तुरंत पहचान लेती थी। अब केवल नाम के सहारे ‘क्रिमिनल इंटेलिजेंस’ साझा करना लगभग असंभव होगा।
अनसुलझे केस (Blind Cases) की बढ़ेगी संख्या: लूट और चेन स्नैचिंग के मामलों में फोटो देखकर ही पुराने पीड़ित थानों तक पहुँचते थे। अब फोटो पर रोक लगने से उन पीड़ितों को न्याय मिलना मुश्किल हो जाएगा जिन्होंने आरोपी का नाम तो नहीं पता था, लेकिन चेहरा याद था।
शिनाख्त परेड (TIP) का बढ़ता बोझ: अब पुलिस को हर छोटे-बड़े मामले में मजिस्ट्रेट के सामने शिनाख्त परेड करानी होगी। इससे जांच की रफ्तार सुस्त होगी और जेल व अदालतों पर काम का दबाव कई गुना बढ़ जाएगा।
सोशल मीडिया पर पुलिस का ‘असर’ होगा खत्म: राजस्थान पुलिस अपने सोशल मीडिया हैंडल्स के जरिए अपराधियों का खौफ पैदा करती थी। अब बिना फोटो के ‘पब्लिक अवेयरनेस’ पोस्ट्स का प्रभाव शून्य हो जाएगा।
ड्रग्स और आर्म्स एक्ट के मामलों में बढ़ेगा जोखिम
नशा तस्करी (NDPS) के मामलों में तस्करों की पहचान उजागर करना युवाओं को सुरक्षित रखने के लिए संजीवनी माना जाता था। अब उनकी पहचान गुप्त रहने से वे जमानत पर बाहर आकर फिर से आसानी से अपना नेटवर्क फैला सकेंगे, क्योंकि समाज उन्हें पहचान नहीं पाएगा।
क्या कहता है जनमानस?
शहर के जागरूक नागरिक अब इस मामले को ‘खंडपीठ’ (Division Bench) में ले जाने की तैयारी कर रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं का तर्क है कि “संविधान गरिमा की बात करता है, लेकिन वह गरिमा ‘निर्दोष नागरिक’ की है या ‘समाज को दहलाने वाले लुटेरे’ की? यह तय होना बाकी है।”
अगली सुनवाई: 28 जनवरी
अब पूरे प्रदेश की नजरें 28 जनवरी को होने वाली सुनवाई पर हैं, जहाँ पुलिस प्रशासन को कोर्ट में यह साबित करना होगा कि सार्वजनिक सुरक्षा के लिए अपराधियों का चेहरा दिखाना क्यों जरूरी है।