मंडी के तराजू पर टूटी किसान की उम्मीद — अपाहिज किसान की एक ट्रॉली धान ने खड़े किए कई सवाल

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)।
धान खरीद व्यवस्था में पारदर्शिता और किसान हितों की बात करने वाले तंत्र की जमीनी हकीकत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पुसौर तहसील के ग्राम पंचायत मचिदा, पोस्ट पडीगांव निवासी श्री बामदेव प्रधान (पिता– पालेश्वर प्रधान) का मामला न केवल प्रशासनिक संवेदनहीनता को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि नियमों की व्याख्या किस तरह कमजोर किसानों के लिए बोझ बनती जा रही है।
दोनों पैरों से अपाहिज बामदेव प्रधान अपनी एकमात्र आजीविका के सहारे—धान की खेती—से 22-22 क्विंटल धान की एक ट्रॉली लेकर मंडी पहुंचे थे। यह वही धान है जिसे उन्होंने अपनी एकमात्र फसल के रूप में हार्वेस्टर मशीन से कटवाया था। लेकिन मंडी में पहुंचते ही उनकी मेहनत पर सवालिया निशान लगा दिया गया।
मंडी अधिकारियों और एसडीएम का तर्क था कि धान “सही नहीं” है, यह “मिक्स” प्रतीत हो रहा है और आशंका जताई गई कि किसान पुराना धान बेचने आया है। जबकि हकीकत यह है कि हार्वेस्टर मशीन से कटाई के दौरान आसपास के खेतों के अलग-अलग किस्म के धान मिल जाना कोई असामान्य बात नहीं है। गांव-देहात का हर किसान इस सच्चाई से परिचित है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक फसल वाले किसान के पास पुराना धान आखिर आएगा कहां से?
यदि धान पूरी तरह सुखाकर लाने को कहा जाता है, तो वही धान “पुराना” बताकर वापस कर दिया जाता है। ऐसे में किसान करे तो करे क्या?
सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले में एसडीएम स्तर से धान जब्ती का दबाव भी बनाया गया। जब्ती की बात सुनते ही पहले से ही शारीरिक रूप से असहाय किसान मानसिक रूप से टूट गया। डर और दबाव के बीच बामदेव प्रधान को मजबूरन अपनी ट्रॉली वापस ले जानी पड़ी।
हैरानी की बात यह रही कि जब मंडी प्रबंधक द्वारा इस विषय पर एसडीएम से फोन पर बातचीत कराई गई, तब किसान खेत में मौजूद था। बातचीत के दौरान धान को जब्त करने के निर्देश दिए जाने की बात सामने आई, जिससे स्थिति और भयावह हो गई। एक गरीब, अपाहिज किसान के लिए “जब्ती” जैसे शब्द ही काफी होते हैं—उसकी साल भर की मेहनत, उसकी उम्मीद और उसका भविष्य सब एक साथ दांव पर लग जाता है।

यह पूरा प्रकरण केवल एक किसान की पीड़ा नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था का आईना है जहां नियमों की कठोरता और मानवीय संवेदना के बीच की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। सवाल यह भी है कि क्या मंडी व्यवस्था सिर्फ ताकतवर और साधन-संपन्न किसानों के लिए है?
क्या हर बार शक की सुई कमजोर किसान की ओर ही क्यों घूमती है?
बामदेव प्रधान का धान वापस लौटाया जाना सिर्फ एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि ग्रामीण अंचल में भरोसे के ताने-बाने पर एक गहरी चोट है। यदि यही हाल रहा, तो मंडी किसानों के लिए सहारा नहीं, डर का पर्याय बनती चली जाएगी।
अब जरूरत है कि इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच हो, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय की जाए और सबसे अहम—ऐसे किसानों को न्याय मिले, जिनकी आवाज अक्सर फाइलों और आदेशों के शोर में दबा दी जाती है।
क्योंकि सवाल सिर्फ धान का नहीं, किसान के सम्मान का है।