ग्रामसभा का फ़ैसला बनाम सरकारी फ़ाइलें: बासनपाली ने शहरीकरण को रोका, गांव होने का हक़ दोहराया

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ (तमनार)।
विकास जब काग़ज़ों में चमकता है और ज़मीन पर सवाल खड़े करता है, तब गांव अपनी आवाज़ खोजते हैं। तमनार विकासखंड की ग्राम पंचायत बासनपाली में यही हुआ। विशेष ग्रामसभा में जुटे सैकड़ों ग्रामीणों ने एकमत होकर स्पष्ट कर दिया—नगर पंचायत का प्रस्ताव उन्हें मंज़ूर नहीं। गांव ने नारा नहीं दिया, निर्णय लिया: “बासनपाली ग्राम पंचायत था, है और रहेगा।”
दरअसल, तमनार के साथ बासनपाली को जोड़कर नगर पंचायत बनाए जाने की तैयारी चल रही थी। प्रस्ताव की आहट भर से गांव में हलचल तेज हो गई। चर्चा चौपालों से निकलकर ग्रामसभा तक पहुंची और वहीं थमी—एक सर्वसम्मत प्रस्ताव के रूप में। ग्रामीणों का कहना था कि नगर पंचायत का दर्जा विकास की गारंटी नहीं देता, बल्कि वह उस स्वशासन पर आघात करता है, जो पीढ़ियों से उनकी पहचान रहा है।
ग्रामसभा में सबसे गंभीर सवाल अनुसूचित क्षेत्र और पेसा कानून को लेकर उठा। बासनपाली आदिवासी बहुल इलाका है, जहां पेसा महज़ एक अधिनियम नहीं, बल्कि जीवन पद्धति है। बैठक में पेसा के प्रावधानों का पाठ किया गया और समझाया गया कि ग्रामसभा सर्वोच्च संस्था है—जिसके अधिकार नगर पंचायत बनने पर सिमट सकते हैं। जमीन, जंगल, जल और स्थानीय संसाधनों पर गांव की निर्णायक भूमिका कमजोर पड़ने की आशंका ने ग्रामीणों को एकजुट किया।
ग्राम पंचायत और नगर पंचायत के फर्क को लेकर चर्चा सतही नहीं रही। ग्रामीणों ने साफ कहा कि ग्राम पंचायत में फैसले स्थानीय ज़रूरतों और परंपराओं के अनुरूप होते हैं, जबकि नगर पंचायत बनने पर निर्णयों में नौकरशाही का दखल बढ़ता है। भवन निर्माण, भूमि उपयोग, कर व्यवस्था और संसाधनों पर अधिकार—इन सब पर गांव की सीधी भागीदारी घट जाती है। यही वजह है कि इस प्रस्ताव को उन्होंने ‘विकास’ नहीं, बल्कि ‘नियंत्रण’ के रूप में देखा।
आशंकाएं सिर्फ़ सैद्धांतिक नहीं थीं। वक्ताओं ने बताया कि नगर पंचायत बनने के बाद करों का बोझ बढ़ेगा, जमीन की कीमतें बढ़ेंगी—लेकिन जमीन पर गांव का अधिकार कमजोर होगा। बाहरी निवेश और बसाहट से स्थानीय समुदाय के हाशिये पर जाने का खतरा भी रेखांकित किया गया। आदिवासी समाज के लिए यह चिंता और गहरी है, क्योंकि उनकी आजीविका सीधे जमीन और जंगल से जुड़ी है—जिसे बाज़ार की भाषा में तौलना उनके अस्तित्व पर सवाल खड़ा करता है।
ग्रामसभा ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि ग्रामीणों की इच्छा के विरुद्ध प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई, तो विरोध सिर्फ़ प्रस्तावों तक सीमित नहीं रहेगा। न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाने से लेकर जनआंदोलन तक—हर विकल्प खुला है। बैठक से यह संकेत भी मिला कि यह मुद्दा बासनपाली तक सीमित नहीं रहेगा; तमनार क्षेत्र में व्यापक जनचेतना की जमीन तैयार हो चुकी है।

यह ग्रामसभा एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती है—विकास किसके लिए और किसकी सहमति से? बासनपाली ने साफ कहा है कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास जो उनकी पहचान, अधिकार और स्वशासन को निगल जाए, स्वीकार्य नहीं।
बासनपाली का फैसला सिर्फ़ एक गांव का निर्णय नहीं, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए चेतावनी है—फ़ाइलें आगे बढ़ाने से पहले ज़मीन की आवाज़ सुनिए। वरना शहरीकरण की यह आहट, गांव-गांव से उठकर पूरे इलाके की प्रतिध्वनि बन सकती है।