सड़क पर उतरी भूख, जंगलों में दर्ज हुई चुप्पी

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
औद्योगिक जिला रायगढ़ की सड़कों पर जब बंदरों के झुंड दिखाई देते हैं, तो यह दृश्य किसी रोमांचक समाचार का विषय नहीं होना चाहिए। यह न तो कौतूहल है, न ही प्रकृति का कोई विचित्र खेल। यह उस चुप्पी की तस्वीर है, जो जंगलों में लगातार गहराती जा रही है—और जिसकी गूंज अब शहर की सड़कों पर सुनाई देने लगी है।
जिसे हम अक्सर “बंदरों की बढ़ती संख्या” या “शहर में वन्यजीवों का हस्तक्षेप” कहकर टाल देते हैं, दरअसल वह एक लंबी, सुनियोजित और लगातार की गई मानवीय भूल का परिणाम है। जंगल कटते हैं, पहाड़ खोदे जाते हैं, औद्योगिक परिसर फैलते हैं—और हर बार हम मान लेते हैं कि विस्थापन केवल मनुष्य का होता है। जबकि सच यह है कि विस्थापन सबसे पहले उन प्राणियों का होता है, जिनकी आवाज़ हमारे विकास के शोर में दब जाती है।
बंदरों का सड़क पर उतरना उनकी आदत का परिवर्तन नहीं है, जैसा अक्सर कहा जाता है। यह उनके हालात का परिवर्तन है। जंगलों में फलदार वृक्ष नहीं रहे, जलस्रोत सूख गए, और वह प्राकृतिक चक्र टूट गया जिसमें वे बिना किसी पर निर्भर हुए जी सकते थे। भूख जब जंगल में टिक नहीं पाती, तो वह शहर की ओर कदम बढ़ाती है।
कभी कोई राहगीर दया में आकर मुट्ठी भर दाने या एक केला थमा देता है। वह क्षणिक करुणा का दृश्य होता है, पर उससे समस्या हल नहीं होती—बल्कि और गहरी हो जाती है। वन्यजीव धीरे-धीरे मनुष्य पर निर्भर होने लगते हैं, और फिर वही समाज उन्हें “उपद्रव” कहकर खारिज कर देता है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि हमारी विकास-नीति की सीधी परिणति है।
रायगढ़ कोई अपवाद नहीं है। यह उस पूरे मॉडल की तस्वीर है, जिसमें जंगल केवल ज़मीन का टुकड़ा होते हैं और जीव केवल बाधा। हमने पर्यावरण को संरक्षण के बजाय प्रबंधन का विषय बना दिया है—और प्रबंधन में संवेदना की जगह आंकड़े ले लेते हैं।
यह दया का प्रश्न नहीं है। यह जिम्मेदारी का प्रश्न है। जब हम कहते हैं कि यह एक “सभ्य समाज” है, तो हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि यह सभ्यता किनकी कीमत पर खड़ी है। जिन बंदरों को आज हम सड़क किनारे खड़ा देखते हैं, वे हमारे विकास की मौन फाइलें हैं—जिन पर कभी कोई सार्वजनिक सुनवाई नहीं हुई।
विकास अगर जंगल से जीवन छीन ले और शहर को असहज कर दे, तो उस पर पुनर्विचार जरूरी है। वरना आने वाले समय में सड़कों पर केवल बंदर नहीं होंगे—हमारी असफलताओं की पूरी श्रृंखला हमारे सामने खड़ी होगी, और तब शायद लिखने के लिए भी शब्द नहीं बचेंगे।