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अब लापरवाही पर लगेगी कीमत, फ्लाई एश नहीं संभाला तो पावर प्लांटों पर गिरेगी गाज

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़ जिले में वर्षों से पर्यावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने फ्लाई एश के निपटान को लेकर अब सख्ती तय मानी जा रही है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने पावर प्लांटों के लिए स्पष्ट निर्देश जारी कर दिए हैं कि अब केवल कागज़ी खानापूर्ति से काम नहीं चलेगा। शत-प्रतिशत फ्लाई एश यूटीलाइजेशन नहीं हुआ तो सीधे पेनाल्टी लगेगी।

सीपीसीबी ने सभी पावर प्लांटों को तीन साल का एक निश्चित चक्र दिया है। इस त्रिवर्षीय चक्र में हर हाल में सौ फीसदी फ्लाई एश का उपयोग सुनिश्चित करना होगा। इसके साथ ही हर वर्ष कम से कम 80 प्रतिशत यूटीलाइजेशन का लक्ष्य पूरा करना अनिवार्य रहेगा। वर्ष 2026 से इस पूरे सिस्टम का ऑडिट शुरू किया जा रहा है।

रायगढ़ जिले में स्थिति इसलिए भी गंभीर है क्योंकि यहां करीब 25 पावर प्लांट संचालित हैं। इन सभी से भारी मात्रा में फ्लाई एश निकलता है, लेकिन उसके उपयोग की व्यवस्था बेहद सीमित है। ईंट-भट्ठों में फ्लाई एश का इस्तेमाल नाममात्र का है। अधिकांश राखड़ या तो निचले इलाकों में या बंद खदानों में डंप की जा रही है। यह तरीका पर्यावरण और भूजल दोनों के लिए बड़ा खतरा बन चुका है, जिस पर भूजल बोर्ड भी चिंता जता चुका है।

सीपीसीबी के निर्देशों के अनुसार अब हर तीन साल में पावर प्लांटों की रिपोर्ट का गहन मूल्यांकन किया जाएगा। वर्ष 2026 में पहला तीन वर्षीय चक्र पूरा हो रहा है। इसके बाद यह जांच की जाएगी कि संबंधित प्लांट ने वास्तव में शत-प्रतिशत फ्लाई एश का उपयोग किया है या नहीं। यदि प्लांट परिसर में या अन्य किसी स्थान पर राखड़ डंप पाई गई, तो प्रति टन के हिसाब से भारी पेनाल्टी लगाई जाएगी।

सबसे बड़ा सवाल फ्लाई एश की वास्तविक मात्रा को लेकर है। जिले में सालाना करीब डेढ़ करोड़ टन फ्लाई एश निकलने का अनुमान है, जो आने वाले दो वर्षों में बढ़कर दो करोड़ टन से ज्यादा हो सकता है। जानकारों का कहना है कि छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल को जो आंकड़े पावर प्लांटों द्वारा दिए जाते हैं, वे पूरी तरह सही नहीं होते। कोयला खपत और फ्लाई एश उत्पादन के आंकड़ों में साफ विरोधाभास नजर आता है। जितना कोयला उपयोग दिखाया जाता है, उसके अनुपात में राखड़ की मात्रा कम बताई जाती है। आशंका है कि इस अंतर को अवैध डंपिंग के जरिए छिपाया जा रहा है।

एक और गंभीर पहलू है ‘लीगेसी फ्लाई एश’। यह वह राखड़ है, जो सालों से पावर प्लांटों के आसपास जमा होती चली आ रही है। इस पुराने फ्लाई एश को अब तक न तो पूरी तरह हटाया जा सका है और न ही इसके निपटान की ठोस योजना बनी है। चौंकाने वाली बात यह है कि कई रिपोर्टों में इस लीगेसी एश को शामिल ही नहीं किया जाता।

कुल मिलाकर साफ है कि अब फ्लाई एश के मामले में ढिलाई की गुंजाइश खत्म होती जा रही है। आने वाला समय यह तय करेगा कि पावर प्लांट नियमों का पालन करते हैं या फिर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने की कीमत पेनाल्टी के रूप में चुकानी पड़ेगी। रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिले के लिए यह फैसला आने वाले वर्षों में हवा, पानी और जमीन की सेहत तय करने वाला साबित हो सकता है।

Amar Chouhan

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