एक ही योजना, तीन पंचायतें और तीन कहानी — पुसौर में पृथक्करण शेड निर्माण पर सवालों की परतें



Freelance editor Amardeep chauhan@http://amarkhabar.com Raigarh
छत्तीसगढ़ सरकार स्वच्छता और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन को लेकर योजनाओं के माध्यम से गांवों को आत्मनिर्भर बनाने की बात करती है, लेकिन जमीनी हकीकत कई बार इन दावों को कठघरे में खड़ा कर देती है। ऐसा ही एक मामला रायगढ़ जिले के पुसौर विकासखंड से सामने आया है, जहाँ ग्राम पंचायतों में बनाए जा रहे पृथक्करण शेड निर्माण कार्य अब संदेह के घेरे में आ गए हैं।
वर्ष 2024–25 में पुसौर ब्लॉक की कई ग्राम पंचायतों में पृथक्करण शेड निर्माण की स्वीकृति दी गई। उद्देश्य स्पष्ट था—कचरे का वैज्ञानिक तरीके से पृथक्करण और स्वच्छता व्यवस्था को मजबूती। लेकिन जब तीन ग्राम पंचायतों में मौके पर जाकर निरीक्षण किया गया, तो जो दृश्य सामने आए, उन्होंने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए।
निरीक्षण में पाया गया कि एक ही ब्लॉक, एक ही योजना होने के बावजूद तीन ग्राम पंचायतों में राशि स्वीकृति, निर्माण गुणवत्ता और कार्य पद्धति तीनों अलग-अलग हैं।
ग्राम पंचायत कोसमंदा में पृथक्करण शेड के लिए 4.10 लाख रुपये स्वीकृत किए गए।

ग्राम पंचायत तुरंगा में यही राशि घटकर 3.70 लाख रुपये रह गई।

वहीं ग्राम पंचायत देवलसुर्रा में निर्माण कार्य मात्र 3.60 लाख रुपये में निपटा दिया गया।

सवाल यह नहीं है कि किस पंचायत को कितनी राशि मिली, बल्कि यह है कि जब योजना, डिजाइन और उद्देश्य एक ही है, तो लागत में इतना अंतर क्यों? इससे भी अधिक चौंकाने वाली बात यह है कि तीनों पंचायतों में बने शेड की गुणवत्ता, सामग्री और निर्माण तरीका भी एक-दूसरे से मेल नहीं खाता। कहीं अधूरा निर्माण, कहीं कमजोर ढांचा तो कहीं मानकों से कोसों दूर कार्य नजर आया।
सूचना पट्ट, फोटो और वीडियो में यह अंतर साफ तौर पर देखा जा सकता है। निर्माण एजेंसी के रूप में ग्राम पंचायत स्वयं है, यानी जवाबदेही भी स्थानीय स्तर पर तय होती है। ऐसे में जनपद पंचायत के सीईओ, संबंधित इंजीनियर, पंचायत सचिव और सरपंचों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
यह मामला अब केवल निर्माण की अनियमितता तक सीमित नहीं रह जाता, बल्कि यह दर्शाता है कि सरकारी योजनाओं में छोटी-छोटी राशियों को भी नहीं छोड़ा जा रहा। पंचायत से लेकर जनपद स्तर तक, हर पायदान पर सवाल खड़े होते हैं कि आखिर निगरानी और तकनीकी स्वीकृति की प्रक्रिया किस तरह निभाई जा रही है।

सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन योजनाओं का सीधा संबंध स्वच्छता, स्वास्थ्य और पर्यावरण से है, वही योजनाएं यदि कागजों और कमीशन की भेंट चढ़ने लगें, तो ग्रामीण विकास की दिशा ही भटक जाती है।
अब जरूरत है कि इस पूरे मामले की स्वतंत्र और तकनीकी जांच कराई जाए, ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके। वरना पृथक्करण शेड के नाम पर यह “पृथक्करण” केवल कागजों और बजट में ही सिमट कर रह जाएगा, और गांवों की तस्वीर जस की तस बनी रहेगी।
News associate Padmanabh pradhan