सरकारी उपेक्षा की भेंट चढ़ी एसईसीएल की खदानें: निजी कंपनियों को हरी झंडी, कोल इंडिया की परियोजनाएं वर्षों से ठप

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम | रायगढ़ | 11 जनवरी 2026
रायगढ़ जिले में कोयला उत्पादन बढ़ाने और सरकारी राजस्व में इजाफा करने का दावा केवल कागजों तक सीमित नजर आ रहा है। जमीनी हकीकत यह है कि कोल इंडिया की अनुषंगी कंपनी एसईसीएल (SECL) की चार प्रमुख खदानें आज भी भू-अर्जन और जनसुनवाई के पचड़े में फंसी हुई हैं, जबकि निजी कंपनियों की खदानों को शुरू कराने के लिए प्रशासनिक मशीनरी पूरी ताकत से मैदान में उतर जाती है।
दुर्गापुर, पेलमा, पोरडा-चिमटापानी और बरौद—ये चारों खदानें ऐसी हैं, जिनसे न सिर्फ करोड़ों रुपये का सरकारी राजस्व मिल सकता है, बल्कि सैकड़ों स्थानीय लोगों को स्थायी रोजगार भी उपलब्ध हो सकता है। इसके बावजूद इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में सरकार और प्रशासन की सुस्ती सवालों के घेरे में है।
पिछले तीन महीनों में रायगढ़ जिले में दो निजी कोयला खदानों की जनसुनवाई कराने की कोशिशें हुईं। भारी विरोध, हंगामा और तनावपूर्ण माहौल के बावजूद पर्यावरण संरक्षण मंडल और जिला प्रशासन जनसुनवाई कराने मौके पर पहुंचा। दिलचस्प यह है कि निजी कंपनियों की खदानों में न तो ठोस पुनर्वास नीति होती है और न ही प्रभावितों के लिए स्थायी रोजगार की गारंटी, फिर भी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाती।
इसके उलट, एसईसीएल की खदानें वर्षों से फाइलों में धूल फांक रही हैं। पेलमा माइंस का आवंटन एसईसीएल को वर्ष 2010 में हो चुका था। अब जाकर इसकी प्रक्रिया शुरू हुई है। लगभग 2077 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है, जिससे प्रतिवर्ष 15 मिलियन टन कोयला उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इस परियोजना का एमडीओ अडाणी इंटरप्राइजेस को दिया गया है और इसमें 362 हेक्टेयर वन भूमि भी शामिल है। बावजूद इसके, जनसुनवाई की दिशा में ठोस पहल अब तक नहीं दिखती।
धरमजयगढ़ क्षेत्र की दुर्गापुर माइंस का हाल और भी चिंताजनक है। 2016 से भू-अर्जन की प्रक्रिया चल रही है। करीब 1595 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया जा चुका है, लेकिन जनसुनवाई कब होगी और उत्पादन कब शुरू होगा—इसका जवाब किसी के पास नहीं है। पोरडा-चिमटापानी खदान के लिए कुल 1437 हेक्टेयर भूमि में से 691 हेक्टेयर का अर्जन हो चुका है, शेष 746 हेक्टेयर आज भी अधर में लटका है। वहीं बरौद खदान के विस्तार के लिए 151 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण प्रस्तावित है, जो फाइलों में उलझा हुआ है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब एसईसीएल की पुनर्वास नीति स्पष्ट और तय है—प्रति दो एकड़ भूमि पर एक व्यक्ति को नौकरी, वह भी केंद्रीय संस्था में अच्छे वेतन के साथ—तो फिर इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने में 10 से 15 साल क्यों लग रहे हैं? क्या सरकारी खदानों से होने वाला राजस्व और रोजगार सरकार की प्राथमिकता में नहीं है?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि निजी कंपनियों के लिए प्रशासनिक सक्रियता दिखाई देती है, लेकिन एसईसीएल के मामलों में वही तंत्र मौन साध लेता है। यदि यही रवैया रहा, तो न सिर्फ सरकारी खजाने को नुकसान होगा, बल्कि स्थानीय युवाओं के हाथ से स्थायी रोजगार के अवसर भी फिसलते रहेंगे।
अब जरूरत इस बात की है कि सरकार और जिला प्रशासन अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट करें। क्या कोल इंडिया और एसईसीएल की परियोजनाएं केवल कागजी योजनाएं बनकर रह जाएंगी, या वास्तव में इन्हें जमीन पर उतारने की कोई गंभीर मंशा भी है? जवाब अब भी प्रतीक्षा में है।