दैनिक वेतनभोगियों के हाथों लाखों का गबन, पीडीएस बारदाना घोटाले ने शासन-प्रशासन को कटघरे में खड़ा किया

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम लैलूंगा।
सरकारी तंत्र की सबसे कमजोर कड़ी—दैनिक वेतनभोगी व्यवस्था—एक बार फिर सवालों के घेरे में है। विपणन विभाग के दो दैनिक वेतनभोगी कर्मचारियों और एक वाहन चालक ने मिलकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के बारदाने को खुले बाजार में बेचकर शासन को 22 लाख 33 हजार 525 रुपये का चूना लगा दिया। मामला सामने आने के बाद विभागीय अधिकारियों ने लैलूंगा थाने में एफआईआर दर्ज कराई है, जबकि दोनों कर्मचारी अहम दस्तावेजों के साथ फरार हैं।
पुलिस के अनुसार जिन लोगों के खिलाफ अपराध दर्ज किया गया है, उनमें वाहन चालक किशन निषाद (पिता रामचरण निषाद, निवासी भुईंयापानी, लैलूंगा), दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी देवकुमार यादव (पिता छेडूराम यादव, वार्ड क्रमांक 06, घरघोड़ा) और शिवाकांत तिवारी (पिता दिवाकर तिवारी, घरघोड़ा) शामिल हैं। तीनों के विरुद्ध धारा 173 बीएनएस तथा 316 (3), 3 (5) के तहत अपराध पंजीबद्ध किया गया है।
जून से दिसंबर तक चला खेल
जांच में सामने आया है कि 1 जून से 31 दिसंबर के बीच लैलूंगा क्षेत्र के भुईंयापानी निवासी चालक किशन निषाद द्वारा लैलूंगा, घरघोड़ा और तमनार क्षेत्र की विभिन्न राशन दुकानों से पीडीएस बारदाने का उठाव किया गया। इस बारदाने का उपयोग धान खरीदी केंद्रों में किया जाना था।
आंकड़ों के मुताबिक—
लैलूंगा क्षेत्र से 95,198 नग
घरघोड़ा क्षेत्र से 51,500 नग
तमनार क्षेत्र से 90,475 नग
इस तरह कुल 2,37,173 नग पीडीएस बारदाना उठाया गया। रिकॉर्ड में दिखाया गया कि इनमें से 1,44,907 नग बारदाना विभिन्न धान खरीदी केंद्रों में पहुंचा।
भौतिक सत्यापन में खुला राज
जब विभाग ने भौतिक सत्यापन कराया तो कहानी पूरी तरह बदल गई।
चालक किशन निषाद के घर से 1,650 नग
घरघोड़ा स्थित विपणन विभाग के गोदाम से 1,275 नग
इस प्रकार कुल 1,47,832 नग बारदाना ही मौके पर मिला। शेष 89,341 नग बारदाना गायब पाया गया, जिसकी बाजार कीमत 22.33 लाख रुपये आंकी गई है। जांच एजेंसियों का मानना है कि यही बारदाना बाजार में बेच दिया गया।
फरार कर्मचारी, दस्तावेज भी गायब
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि दोनों दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी डीएम पर्ची और गोदाम का स्टॉक पंजी अपने साथ लेकर फरार हो गए हैं। इससे न केवल जांच प्रभावित हो रही है, बल्कि विभागीय नियंत्रण और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
बड़ा सवाल: भरपाई कैसे होगी?
यह पूरा मामला एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा करता है कि जब दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी इतने बड़े स्तर पर सरकारी संपत्ति का गबन कर देते हैं, तो शासन को हुई क्षति की भरपाई आखिर किससे और कैसे होगी? क्या जवाबदेही सिर्फ निचले स्तर तक सीमित रहेगी, या इस पूरे तंत्र की जिम्मेदारी तय की जाएगी?
फिलहाल लैलूंगा पुलिस तीनों आरोपियों की तलाश में जुटी है। लेकिन यह मामला केवल एक एफआईआर तक सीमित नहीं है—यह सरकारी व्यवस्थाओं की कमजोर निगरानी, संवेदनशील संसाधनों के दुरुपयोग और जवाबदेही के अभाव की कहानी भी कहता है, जो आने वाले दिनों में और भी बड़े सवाल खड़े कर सकता है।