छत्तीसगढ़ के हाथी गलियारों पर कोयले का दबाव: धरमजयगढ़ में 18 कोल ब्लॉकों के खिलाफ हजारों ग्रामीण (1किमी लम्बी मानव श्रृंखला) सड़क पर (देखें वीडियो..

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम रायगढ़/धरमजयगढ़।
छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल रायगढ़ जिले में विकास बनाम पर्यावरण की बहस एक बार फिर सड़कों पर उतर आई है। धरमजयगढ़ वन मण्डल में प्रस्तावित 18 कोल ब्लॉकों के विरोध में सोमवार को हजारों ग्रामीणों ने आमसभा और एक किलोमीटर लंबी रैली निकालकर केंद्र और राज्य सरकार से खनन योजनाओं पर तत्काल रोक लगाने की मांग की।
यह इलाका न सिर्फ पांचवीं अनुसूची के तहत संरक्षित आदिवासी क्षेत्र है, बल्कि जंगली हाथियों के सबसे संवेदनशील रहवास क्षेत्रों में भी गिना जाता है।
हाथियों का स्थायी इलाका, खनन की योजना
धरमजयगढ़ वन मण्डल का कुल वन क्षेत्र लगभग 1.71 लाख हेक्टेयर है। इनमें से छाल और धरमजयगढ़ रेंज का करीब 36 हजार हेक्टेयर घना जंगल जंगली हाथियों का स्थायी विचरण क्षेत्र माना जाता है। इसी क्षेत्र में 52 आदिवासी ग्राम पंचायतें स्थित हैं, जो संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून, 1996 के अंतर्गत आती हैं।
ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इतनी संवेदनशील भौगोलिक स्थिति के बावजूद यहां ओपन कास्ट कोयला खनन की योजना बनाना पर्यावरणीय और संवैधानिक दोनों दृष्टि से गंभीर सवाल खड़े करता है।
मानव–हाथी संघर्ष के आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं
आंदोलन के दौरान रखे गए आंकड़े बताते हैं कि यह क्षेत्र पहले से ही गंभीर संकट से जूझ रहा है।
वर्ष 2001 से अब तक हाथी–मानव संघर्ष में 167 लोगों की मौत हो चुकी है। इनमें से 113 मौतें केवल छाल और धरमजयगढ़ रेंज में दर्ज की गई हैं।
वहीं 2005 के बाद 63 जंगली हाथियों की मौत हुई है, जिनमें से 54 हाथी इन्हीं दोनों रेंजों में मारे गए।
पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि बड़े पैमाने पर खनन से हाथियों के पारंपरिक गलियारे टूटेंगे, जिससे यह संघर्ष और अधिक बढ़ सकता है।
18 कोल ब्लॉक, जिनमें 6 की नीलामी हो चुकी
प्रस्तावित 18 कोल ब्लॉकों में से 6 की नीलामी पहले ही की जा चुकी है। इनमें दुर्गापुर–सारिया, तराईमार, शेरबन, दुर्गापुर–शाहपुर, पुरूंगा और बायसी कोल ब्लॉक शामिल हैं। शेष 12 कोल ब्लॉकों की नीलामी प्रक्रिया को लेकर स्थानीय स्तर पर गहरी आशंका जताई जा रही है।
आदिवासी संगठनों का कहना है कि ओपन कास्ट खनन से जंगल का बड़े पैमाने पर विनाश होगा और हाथियों का यह इलाका धीरे-धीरे “डेड ज़ोन” में तब्दील हो सकता है।
मांड नदी पर भी खतरा
धरमजयगढ़ क्षेत्र से होकर बहने वाली मांड नदी, जो लगभग 50 किलोमीटर तक इस वन क्षेत्र को जल उपलब्ध कराती है, खनन के संभावित प्रभावों की जद में है। ग्रामीणों का आरोप है कि कोयला खनन से निकलने वाली धूल और अपशिष्ट से नदी के प्रदूषित होने का खतरा है, जिससे वन्यजीवों के साथ-साथ स्थानीय आबादी भी प्रभावित होगी।
क्या कहती हैं मांगें
प्रदर्शनकारियों ने सरकार से
छाल और धरमजयगढ़ रेंज को ‘हाथी प्रभावित एवं आरक्षित क्षेत्र’ घोषित करने,
लेमरू हाथी परियोजना को मजबूत करने,
और जंगलों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत सुरक्षित करने
की मांग की।
केंद्र और राज्य सरकार तक पहुंचाया गया ज्ञापन
इस मुद्दे पर ज्ञापन केंद्रीय कोयला मंत्री, केंद्रीय पर्यावरण मंत्री, छत्तीसगढ़ के राज्यपाल, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग, छत्तीसगढ़ शासन के वन मंत्री और माननीय राष्ट्रपति तक भेजे गए हैं।
आंदोलन तेज करने की चेतावनी
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि नीलाम किए गए 6 कोल ब्लॉकों को निरस्त नहीं किया गया और शेष 12 पर तत्काल रोक नहीं लगी, तो आंदोलन को राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक ले जाया जाएगा।
धरमजयगढ़ का यह विरोध अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बनकर उभरा है—
क्या ऊर्जा सुरक्षा की कीमत जंगल, हाथी और आदिवासी समुदाय चुकाएंगे?