रायगढ़: हाथी शावक का अनोखा दशकर्म, ग्रामीणों ने किया मृत्यु भोज का आयोजन

छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में प्रकृति और परंपरा का अनोखा संगम देखने को मिला, जब गौरमुड़ी गांव के ग्रामीणों ने तालाब में डूबकर मरे हाथी शावक की आत्मा की शांति के लिए मानव रीति-रिवाजों के अनुसार दशकर्म का आयोजन किया। वन्यजीव के लिए इस प्रकार का धार्मिक संस्कार प्रदेश में शायद पहली बार हुआ है। पूरे कार्यक्रम में ग्रामीणों ने आपस में चंदा जुटाया और 200 से अधिक लोगों ने मृत्यु भोज ग्रहण कर हाथी शावक के प्रति अपनी संवेदना व्यक्त की।
कैसे हुई घटना — तालाब में डूबा मासूम हाथी
तमनार वनपरिक्षेत्र अंतर्गत गौरमुड़ी गांव में लगभग दस दिन पहले एक हाथी के बच्चे की तालाब में डूबकर दर्दनाक मौत हो गई थी। ग्रामीणों ने तत्काल वन विभाग को सूचना दी, जिसके बाद टीम मौके पर पहुंची। पंचनामा बनाकर शव को ग्रामीणों की मदद से तालाब किनारे ही दफना दिया गया।
परंतु इस घटना के बाद जंगल का माहौल बदल गया। ग्रामीणों के अनुसार हाथियों का झुंड कई दिनों तक आसपास मंडराता रहा, फसलों को नुकसान पहुंचाया और गांव में दहशत की स्थिति बन गई। तालाब पर निस्तारी तक बंद करनी पड़ी।
मृत्यु के बाद बढ़े हाथियों के उत्पात से चिंतित हुए ग्रामीण
गांव के बड़े-बुजुर्गों ने बताया कि हाथी शावक की मौत के बाद झुंड का व्यवहार आक्रामक हो गया था। कई खेत रौंदे गए और तालाब के पास हाथियों की लगातार आवाजाही बढ़ गई। ग्रामीणों ने माना कि यह किसी अनहोनी का संकेत हो सकता है।
इसी चर्चा के बीच गांव में यह राय बनी कि मृत हाथी शावक की आत्मा की शांति के लिए विशुद्ध हिन्दू रीति-विधान से दशकर्म किया जाए, ताकि गांव में शांति बनी रहे और हाथियों का उत्पात भी शांत हो।
हिंदू रीति-विधान से अनूठा दशकर्म, 200 से ज्यादा ग्रामीण हुए शामिल
बुधवार को तालाब किनारे पूरे विधि-विधान से दशमी संस्कार आयोजित किया गया। पूजा-पाठ, तिलांजलि और पिंडदान कर हाथी शावक को ‘कर्मविधि’ दी गई।
ग्रामीणों ने बताया कि सबकी सहमति से चंदा जुटाया गया और शुद्ध भोजन बनाकर सभी को प्रसाद के रूप में परोसा गया। 200 से अधिक ग्रामीण इस अनूठे मृत्यु भोज में शामिल हुए।
प्रदेश में पहली बार ऐसा आयोजन
वन विभाग के कर्मचारियों ने भी माना कि उन्होंने हाथी या किसी भी वन्यजीव के लिए इस प्रकार के पारंपरिक दशकर्म संस्कार का आयोजन पहली बार देखा है।
गांव में यह आयोजन चर्चा का विषय बना हुआ है। ग्रामीणों की मान्यता है कि इससे प्रकृति प्रसन्न होती है और गांव में शांति का वातावरण बनता है।