उरबा NOC विवाद गहराया: बिना ग्रामसभा अनुमति 2077 हेक्टेयर भूमि पर दी गई अनापत्ति, जाली हस्ताक्षरों का गंभीर आरोप

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम उरबा/तमनार (रायगढ़)।
तमनार विकासखंड के ग्राम उरबा में SECL की प्रस्तावित ओपनकास्ट खदान परियोजना को लेकर उरबा NOC विवाद अब उबाल पर पहुंच गया है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि ग्राम पंचायत ने बिना ग्रामसभा बुलाए ही 2077.935 हेक्टेयर भूमि—जिसमें 362.109 हेक्टेयर वनभूमि भी शामिल है—के लिए SECL को अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर दिया। यह पूरा मामला अब स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक धोखाधड़ी और प्रक्रिया उल्लंघन के गंभीर उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है।
NOC में गलत तारीख और जाली हस्ताक्षर: सबसे बड़ा सवाल—ग्रामसभा कब हुई?
ग्रामीणों का कहना है कि
NOC 13 अक्टूबर 2025 को SECL को सौंप दी गई,
जबकि ग्रामसभा की तिथि 14 अक्टूबर दर्ज की गई है।
यानी अनापत्ति पहले जारी और ग्रामसभा बाद में दिखायी गई—इस विसंगति ने पूरे प्रकरण को संदिग्ध बना दिया है।
जांच में सामने आया कि रजिस्टर में ग्रामसभा अध्यक्ष रामधन राठिया के हस्ताक्षर जाली पाए गए। उन्होंने स्वयं स्पष्ट कहा कि उन्हें बैठक की जानकारी तक नहीं थी, और इस तरह की कोई ग्रामसभा आयोजित ही नहीं हुई थी।
सरपंच–सचिव–पटेल पर आरोप, ग्रामीण बोले: “यह सुनियोजित अनियमितता है”
ग्रामीणों का आरोप है कि
सरपंच रामदुलारी राठिया,
सचिव रविंद्र निषाद,
ग्राम पटेल लालसाय राठिया
ने मिलकर बिना जनमत के NOC जारी की।
ग्रामीणों का कहना है कि यह पेसा कानून, पंचायत नियमों और वनभूमि के संवैधानिक प्रावधानों का खुला उल्लंघन है।
जमीन–जंगल से जुड़े संवेदनशील मामले में प्रशासन की चुप्पी
ग्रामीणों ने SECL प्रबंधन, जिला प्रशासन और कलेक्टर रायगढ़ को कई बार लिखित शिकायतें दीं, लेकिन अब तक किसी स्तर पर जांच या कार्रवाई शुरू नहीं की गई।
वनभूमि शामिल होने के कारण ग्रामीण इसे गंभीर ‘वन–भूमि विवाद’ बता रहे हैं और पूछ रहे हैं—बिना ग्रामसभा के कोई अनुमति वैध कैसे मानी जा सकती है?
ग्रामीणों की मांग—“फर्जी NOC तत्काल निरस्त करें, जिम्मेदारों पर कार्रवाई हो”
उरबा गाँव के लोगों ने एक स्वर में मांग की है कि—
13 अक्टूबर को जारी NOC तुरंत रद्द की जाए,
14 अक्टूबर की दिखावटी ग्रामसभा को अवैध घोषित किया जाए,
सरपंच–सचिव–पटेल पर कड़ी प्रशासनिक व कानूनी कार्रवाई की जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि यह मामला सिर्फ कागजी गलती नहीं, बल्कि सर्पंच–सचिव अनियमितता और अधिकारों के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण है।
लोगों में गहरा असंतोष—“बिना ग्रामसभा के कोई फैसला स्वीकार नहीं”
ग्रामवासियों ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी जानकारी और सहमति के बिना जमीन, जंगल और जल स्रोतों से जुड़े किसी भी निर्णय को स्वीकार नहीं किया जाएगा।
स्थानीय लोगों का विश्वास है कि यदि इस प्रकार की प्रक्रिया को रोक नहीं गया तो गांवों के अधिकार और भविष्य दोनों खतरे में पड़ जाएंगे।
समाचार सहयोगी रोशन डनसेना