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7 दिन की हड़ताल, मौके पर तहसीलदार–एनटीपीसी अधिकारी
लेकिन जवाब शून्य—रायकेरा परियोजना में कानून और भरोसे दोनों पर सवाल

Freelance editor Amardeep chauhan @ amarkhabar.com

रायगढ़। एनटीपीसी रायकेरा कोयला खनन परियोजना के खिलाफ प्रभावित 8 गांवों का आंदोलन अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है। बीते 6 दिनों से तिलाईपाली, कधरमौहा, रामपुर सहित आठ गांवों के किसान, महिलाएं और युवा शांतिपूर्ण हड़ताल पर बैठे हैं। इस दौरान तहसीलदार और एनटीपीसी के कर्मचारी मौके पर जरूर पहुंचे, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी उपस्थिति सिर्फ “स्थिति देखने” तक सीमित रही—न कोई लिखित जवाब, न ठोस निर्णय और न ही मांगों पर स्पष्ट रुख।

ग्रामीणों का कहना है कि परियोजना के तहत तिलाईपाली, कधरमौहा और रामपुर जैसे गांवों में ग्राम सभा से विधिवत अनापत्ति लिए बिना ही कार्य किया जा रहा है, जो पेसा कानून और अधिनियम 2013 दोनों का सीधा उल्लंघन है। अनुसूचित जनजाति बहुल इस क्षेत्र में ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य होने के बावजूद प्रक्रिया अधूरी छोड़ी गई, जिससे पूरे अधिग्रहण पर ही सवाल खड़े हो गए हैं।

ग्रामीणों ने बताया कि भूमि मुआवजा और पुनर्वास को लेकर पूर्व में दिए गए आवेदनों के जवाब में एनटीपीसी द्वारा 2 दिसंबर 2025 को एक स्पष्टीकरण पत्र जारी किया गया था, लेकिन उसमें कई महत्वपूर्ण बिंदुओं को टाल दिया गया। 9 जनवरी 2026 को हुई द्विपक्षीय वार्ता भी बेनतीजा रही। आरोप है कि सवालों का सामना करने के बजाय अधिकारी चर्चा बीच में छोड़कर चले गए, जिससे गांवों में असंतोष और गहरा गया।

आंदोलनकारियों का कहना है कि पुनर्वास अधिनियम 2013 के बिंदु 9.1 की कंडिका (क) और (ख) के अनुसार पुनः सर्वेक्षण, संशोधन और नई कट-ऑफ डेट तय कर पुनर्वास किया जाना चाहिए। वर्तमान में 5 दिसंबर 2006 को कट-ऑफ डेट मानकर मुआवजा दिया जा रहा है, जबकि वास्तविक खनन गतिविधियां 2019 के बाद शुरू हुईं। इससे युवा वर्ग और किसानों को रोजगार, पुनर्व्यवस्थापन और मुआवजे से वंचित होना पड़ रहा है।

ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि तेंदूपत्ता कार्डधारी परिवारों को प्रति कार्ड 5 लाख रुपये मुआवजा देने का आश्वासन एनटीपीसी और प्रशासन द्वारा बैठकों में दिया गया था, लेकिन आज तक इसका भुगतान नहीं किया गया। इसी तरह रोजगार के बदले वार्षिकी बेरोजगारी भत्ता देने की मांग भी अधर में लटकी हुई है, खासकर उन प्रभावित परिवारों के लिए जिन्हें एनटीपीसी या उससे जुड़ी ठेका कंपनियों में नौकरी नहीं मिली।

एक और गंभीर आरोप यह है कि एनटीपीसी द्वारा पूर्व में किसानों से ली गई कई सहमतियां फर्जी तरीके से, बिना पूरी जानकारी दिए प्राप्त की गईं। ग्रामीणों की मांग है कि ऐसी सभी सहमतियों को तत्काल निरस्त किया जाए और निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही पुनर्वास और अन्य मुआवजा, जो बिना तथ्यात्मक आधार के दिया गया है, उस पर भी जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जाए।

28 जनवरी 2026 को दिए गए ताजा ज्ञापन में ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि अधिनियम 2013 के प्रावधानों और उनकी मांगों पर संतोषजनक, प्रमाणिक कार्यवाही नहीं होती, तो वे अनिश्चितकालीन शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू करने को विवश होंगे। उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 19(1)(बी), 19(1)(सी) और 300A का हवाला देते हुए कहा है कि वे अपने संवैधानिक अधिकारों के तहत एनटीपीसी तिलाईपाली कोयला खनन परियोजना और उससे जुड़ी सभी खदानों के कार्यों का विरोध करेंगे, चाहे इसके चलते काम पूरी तरह बाधित ही क्यों न हो जाए।

ग्रामीणों ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि आंदोलन के कारण परियोजना का काम ठप होता है, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी एनटीपीसी, प्रशासन और परियोजना से जुड़ी कंपनियों—वी.पी.आर. माइनिंग लिमिटेड, पी.सी. पटेल माइनिंग लिमिटेड, टी.आर.सी. ट्रांसपोर्ट लिमिटेड और सी.एच.पी. प्रा.लि.—की होगी।

आज हालात यह हैं कि अधिकारी रोज़ मौके पर आ रहे हैं, लेकिन जवाब देने से बच रहे हैं। आंदोलनरत ग्रामीणों का कहना है—“अब सिर्फ निरीक्षण नहीं, निर्णय चाहिए।” रायकेरा परियोजना में यह आंदोलन अब मुआवजे से आगे बढ़कर कानून, पारदर्शिता और सार्वजनिक उपक्रमों की जवाबदेही की बड़ी परीक्षा बन चुका है।

Amar Chouhan

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