विकास की चिमनियों में दम तोड़ता रायगढ़: रोज़गार के बदले सांसों की बलि क्यों?

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम रायगढ़।
यह सवाल अब सिर्फ़ पर्यावरण का नहीं रहा, यह सीधे-सीधे जीवन और मृत्यु का सवाल बन चुका है। रायगढ़ की हवा में घुला ज़हर हर सांस के साथ हमारे फेफड़ों में उतर रहा है और हम चुपचाप इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार करते जा रहे हैं। तथाकथित विकास की कीमत अगर 10–15 साल कम होती उम्र है, तो यह सौदा किसी भी सभ्य समाज के लिए आत्मघाती ही कहलाएगा।
रोज़गार की मजबूरी ने आम आदमी को ऐसी दहलीज़ पर खड़ा कर दिया है, जहाँ पेट भरने के लिए ज़िंदगी दांव पर लगानी पड़ रही है। हालात यह हैं कि लोग जानते हुए भी चुप हैं—क्योंकि उन्हें भरोसा दिला दिया गया है कि आवाज़ उठाने से कुछ नहीं बदलता। “कहकर क्या होगा”, “अकेले क्या कर लेंगे”, “पूरा सिस्टम बड़े लोगों के हाथ में है”—यही वाक्य आज रायगढ़ की सामूहिक मानसिकता बन चुके हैं। सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने जिस चुप्पी को जन्म दिया था, वह आज भी हमारे भीतर ज़िंदा है।
जब-जब कुछ जागरूक नागरिक इस भयावह सच को सामने लाने की कोशिश करते हैं, तो उसे राजनीतिक रंग देकर खारिज कर दिया जाता है। जबकि यह कोई आरोप नहीं, बल्कि विज्ञान और आंकड़ों पर आधारित कठोर सच्चाई है। रायगढ़ की हवा में PM10 और PM2.5 जैसे घातक कण इस कदर बढ़ चुके हैं कि वे नाक और गले को पार कर सीधे फेफड़ों में बस जा रहे हैं। वाहन, उद्योग और ईंधन से निकलने वाला धुआं अब अदृश्य हत्यारे की तरह काम कर रहा है।
नाइट्रोजन डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन ट्राईऑक्साइड जैसी गैसें न सिर्फ़ सांस की बीमारियों को जन्म दे रही हैं, बल्कि अम्लीय वर्षा के ज़रिए ज़हर बनकर हम पर ही लौट रही हैं। नतीजा—दमा, हृदय रोग, कैंसर, त्वचा रोग और रक्त से जुड़ी गंभीर बीमारियाँ। यह सब किसी भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की सच्चाई है।
मानकों की बात करें तो सालाना औसत में PM10 का स्तर 60, PM2.5 का 40 और नाइट्रोजन गैसों का 40 होना चाहिए। मगर रायगढ़ में ये आंकड़े सामान्य इलाकों में 120 को छू रहे हैं, जबकि मिलूपारा, छाल, पूंजीपथरा और कुंजेमुरा जैसे क्षेत्रों में यह 200 तक पहुँच चुके हैं। विशेषज्ञ चेतावनी दे चुके हैं कि PM2.5 अगर 50 के पार हो जाए तो बच्चों को घर से बाहर नहीं निकलना चाहिए, और 65 के ऊपर बुजुर्गों के लिए भी यह जानलेवा हो जाता है। लेकिन रोज़मर्रा की जद्दोजहद ने हमें ऐसे हालात में डाल दिया है कि जान हथेली पर रखकर बाहर निकलना मजबूरी बन चुका है—और हम अपने बच्चों की सांसों को भी जोखिम में डाल रहे हैं।
विडंबना देखिए—जिन बच्चों के “उज्ज्वल भविष्य” के नाम पर हम यह सब सह रहे हैं, वही बच्चे अगर सुरक्षित नहीं रहेंगे तो उस कमाई का क्या अर्थ रह जाएगा? सवाल यह भी है कि हमारे होंठ आखिर क्यों सिले हुए हैं? जनप्रतिनिधियों की खामोशी क्यों है? क्या चौड़ी सड़कें, सुंदर पार्क और भव्य इमारतें उस वक्त किसी काम आएँगी जब सांस लेना ही दूभर हो जाए?
चंद रुपयों की पेनाल्टी लगाकर प्रदूषण पर काबू पाने का भ्रम अब टूट चुका है। जब तक नियम तोड़ने वाले उद्योगों पर सख़्त कार्रवाई नहीं होगी, जब तक ज़िम्मेदार प्रबंधन को वास्तविक सज़ा नहीं मिलेगी, तब तक हालात नहीं बदलेंगे। एक व्यक्ति की हत्या पर क़ानून कठोर है, लेकिन धीमे ज़हर से हो रहे सामूहिक नरसंहार पर कोई धारा नहीं—यह हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है।
रायगढ़ का कसूर सिर्फ़ इतना है कि इसकी धरती खनिजों से समृद्ध है। सवाल यह है कि क्या संसाधनों का सुरक्षित और जिम्मेदार दोहन संभव नहीं? क्या मुनाफ़े और अमीरों की सूची में नाम दर्ज कराने की होड़ इंसानियत से ऊपर हो गई है?
अब समय आ गया है कि जनता खुद आगे आए। पहले शासन-प्रशासन के साथ समाधान की मेज़ पर बैठना होगा, फिर उद्योगपतियों से इंसानियत के नाम पर जवाब माँगना होगा। और अगर वहाँ भी सुनवाई न हो, तो न्यायपालिका के दरवाज़े खटखटाने से पीछे नहीं हटना चाहिए। उम्मीद अभी बाकी है—और उम्मीद ही वह आख़िरी सांस है, जो रायगढ़ को ज़िंदा रख सकती है।
डेस्क रिपोर्ट