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संविधान की धज्जियाँ और उद्योगपतियों की हुकूमत : छत्तीसगढ़ में कानून 25 साल से बेअसर, राष्ट्रपति शासन ही आख़िरी रास्ता

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़।
छत्तीसगढ़ में लोकतंत्र और संविधान के नाम पर जो कुछ चल रहा है, वह कानून का शासन नहीं बल्कि उद्योगपतियों के इशारों पर चलती व्यवस्था का नंगा सच है। बीते 25 वर्षों से राज्य में संविधान और वैधानिक कानूनों को लगातार दरकिनार किए जाने का गंभीर आरोप लगाते हुए सामाजिक कार्यकर्ता राधेश्याम शर्मा ने महामहिम राष्ट्रपति को आवेदन सौंपकर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग की है। इस आशय की जानकारी उन्होंने रायगढ़ में आयोजित प्रेस वार्ता में तीखे और बेबाक शब्दों में दी।

राधेश्याम शर्मा ने दो टूक कहा कि पिछले ढाई दशक में राज्य में एक भी उद्योग विधि-सम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए स्थापित नहीं हुआ। पर्यावरणीय स्वीकृति, ग्रामसभा की सहमति, भूमि अधिग्रहण कानून और वनाधिकार अधिनियम—सब कुछ कागजों में रौंद दिया गया। नतीजा यह है कि रायगढ़ आज देश के सर्वाधिक प्रदूषित औद्योगिक जिलों में गिना जा रहा है। हवा, पानी और जमीन जहरीली हो चुकी है, इंसान ही नहीं बल्कि जंगल, वन्यजीव और जैव विविधता भी तबाही के कगार पर खड़े हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार अब जनहित की नहीं, बल्कि उद्योगपतियों की सरकार बन चुकी है। पुलिस और प्रशासन का इस्तेमाल भय और दमन का औजार बनाकर किया जा रहा है। तमनार क्षेत्र में चल रहे शांतिपूर्ण जनआंदोलन को कुचलने के लिए बल प्रयोग किया गया, जिसमें व्यापक नुकसान हुआ। एक व्यक्ति की मौत तक हो गई, लेकिन आज तक न तो निष्पक्ष जांच हुई और न ही एफआईआर दर्ज की गई। आरोप यह भी लगाया गया कि उद्योग प्रबंधन और पुलिस की मिलीभगत से हिंसा और आगजनी कराई गई, ताकि आदिवासियों और ग्रामीणों की आवाज दबाई जा सके।

राधेश्याम शर्मा ने कहा कि हालात इतने बदतर बना दिए गए कि ग्रामीणों और आदिवासियों को अपने हक के लिए सड़कों पर, धरनों पर बैठने को मजबूर होना पड़ा। संविधान प्रदत्त अधिकार मांगना आज अपराध बना दिया गया है, और सवाल उठाने वालों पर मुकदमे, गिरफ्तारी और दमन थोप दिया जाता है।

न्यायपालिका की भूमिका पर भी उन्होंने कड़े सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि कुछ मामलों में न्यायपालिका से भी संवैधानिक जिम्मेदारियों के अनुरूप हस्तक्षेप नहीं हो पाया, जिससे आम जनता का भरोसा डगमगा रहा है। महिला आरक्षक से जुड़े मामले सहित कई प्रकरणों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अब न्याय की आख़िरी उम्मीद राष्ट्रपति से ही बची है।

उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि महामहिम राष्ट्रपति स्वयं आदिवासी समाज से आती हैं, इसलिए उन्हें छत्तीसगढ़ में आदिवासियों, किसानों और आम नागरिकों के साथ हो रहे अन्याय को गंभीरता से संज्ञान में लेना चाहिए। राधेश्याम शर्मा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संवैधानिक संस्थाओं के लगातार विफल होने, भारी जनहानि, पर्यावरण विनाश और लोकतांत्रिक व्यवस्था के पतन को देखते हुए छत्तीसगढ़ में राष्ट्रपति शासन लागू किया जाना अब अनिवार्य हो चुका है।

यह सिर्फ एक मांग नहीं, बल्कि उस जनता की चीख है, जिसकी आवाज वर्षों से धुएं, धूल और डर के बीच दबा दी गई है।

Amar Chouhan

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