शिविर या औपचारिकता? तमनार से लैलूंगा तक दोहराई गई अव्यवस्था, अब घरघोड़ा पर निगाहें
Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
लैलूंगा, 02 अप्रैल 2026।
जनसमस्या निवारण शिविर—नाम से ही उम्मीद जागती है कि शासन जनता के दरवाज़े तक पहुंचेगा, उनकी बात सुनेगा और समाधान देगा। लेकिन लैलूंगा में आयोजित शिविर ने इन उम्मीदों पर एक बार फिर पानी फेर दिया। जो तस्वीर यहां सामने आई, वह न केवल निराशाजनक है, बल्कि प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है।
ग्रामीण दूर-दराज़ से अपनी समस्याएं लेकर पहुंचे, लेकिन जिन अधिकारियों के भरोसे यह शिविर आयोजित किया जाता है, वही नदारद मिले। नतीजा—लोगों को बिना सुने, बिना समाधान के लौटना पड़ा। सबसे ज्यादा निराशा शिक्षा विभाग को लेकर दिखी, जहां जिला शिक्षा अधिकारी की अनुपस्थिति के कारण कई अहम शिकायतें फाइलों में जाने से पहले ही दम तोड़ गईं।
चौंकाने वाली बात यह रही कि इस पूरे आयोजन की सूचना तक जनप्रतिनिधियों और मीडिया को नहीं दी गई। सवाल उठता है—क्या पारदर्शिता अब सिर्फ कागज़ी शब्द बनकर रह गई है? या फिर जानबूझकर संवाद से दूरी बनाई जा रही है?
यह स्थिति कोई पहली बार नहीं है। कुछ ही समय पहले तमनार में आयोजित शिविर में भी इसी तरह की अव्यवस्था देखने को मिली थी। वहां भी कुछ जिम्मेदार अधिकारी गायब रहे, व्यवस्थाएं बिखरी रहीं और जनता मायूस लौटी। अब लैलूंगा में वही कहानी दोहराई गई है, जिससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि यह कोई अपवाद नहीं, बल्कि एक पैटर्न बनता जा रहा है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि लैलूंगा क्षेत्र जिला पंचायत उपाध्यक्ष और जिला शिक्षा समिति के सभापति दीपक सिदार का गृह क्षेत्र है। ऐसे में यहां इस स्तर की लापरवाही केवल स्थानीय नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की जवाबदेही पर सवाल खड़ा करती है।
इधर जनपद पंचायत लैलूंगा में भी अव्यवस्था के आरोप लगातार सामने आ रहे हैं। जनपद सीईओ प्रीति नायडू पर योजनाओं के क्रियान्वयन में सुस्ती, शिकायतों के लंबित रहने और मूलभूत सुविधाओं के अभाव को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह स्थिति बताती है कि समस्या केवल एक शिविर तक सीमित नहीं है, बल्कि सिस्टम की गहराई में कहीं न कहीं ढीलापन घर कर चुका है।
अब निगाहें घरघोड़ा में प्रस्तावित अगले शिविर पर टिक गई हैं। क्या वहां व्यवस्थाओं में सुधार दिखेगा, या फिर वही पुराना ढर्रा जारी रहेगा?
यह सवाल इसलिए भी अहम है, क्योंकि यदि समय रहते सुधार नहीं हुआ, तो जनसमस्या निवारण शिविर अपनी मूल भावना खोकर केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे—जहां समस्याएं सुनने से ज्यादा, कार्यक्रम पूरा करना प्राथमिकता बन जाएगा।
प्रशासन के लिए यह वक्त आत्ममंथन का है। वरना जनता के धैर्य की भी एक सीमा होती है, और जब वह टूटती है, तो सवाल सिर्फ शिविरों पर नहीं, पूरे सिस्टम पर उठते हैं।