रायगढ़ में सीएसआर का काला सच — करोड़ों की जिम्मेदारी, लेकिन न हिसाब-किताब न निगरानी

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ जिले की पहचान उद्योगों की ऊंची चिमनियों, बिजलीघरों और कोयला खदानों से होती हो, वहां अगर सामाजिक जिम्मेदारी ही सबसे कमजोर कड़ी बन जाए, तो सवाल सिर्फ कंपनियों पर नहीं, व्यवस्था पर भी उठते हैं। रायगढ़ में कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) की स्थिति आज कुछ ऐसी ही है—जहां कानून मौजूद है, पैसा भी है, लेकिन जवाबदेही कहीं गुम हो चुकी है।
कंपनी अधिनियम 2013 की धारा 135 के तहत जिन कंपनियों की नेटवर्थ 500 करोड़ से अधिक, टर्नओवर 1000 करोड़ से ज्यादा या शुद्ध लाभ 5 करोड़ रुपये से ऊपर है, उन्हें अपने पिछले तीन वर्षों के औसत मुनाफे का कम से कम दो प्रतिशत सीएसआर के तहत समाज पर खर्च करना अनिवार्य है। कागजों में यह प्रावधान बेहद सख्त दिखता है, लेकिन रायगढ़ में हकीकत इसके ठीक उलट नजर आती है।
35 से ज्यादा उद्योग, लेकिन सीएसआर का हिसाब शून्य
सूत्रों के मुताबिक रायगढ़ जिले में करीब 35 ऐसे उद्योग हैं, जो सीएसआर के दायरे में आते हैं। इनकी सीएसआर राशि से जिले में सैकड़ों स्कूल, अस्पताल, सड़कें और पेयजल योजनाएं खड़ी की जा सकती थीं। लेकिन स्थिति यह है कि प्रशासन के पास इन कंपनियों की सीएसआर बैलेंस शीट तक उपलब्ध नहीं है। यानी यह तक स्पष्ट नहीं कि कौन कंपनी कितनी सीएसआर राशि देने की पात्र है और किसने कितना खर्च किया।
वर्तमान में केवल एक दो उपक्रम—एनटीपीसी और एसईसीएल —ही ऐसे हैं, जो सीएसआर के तहत काम कर रहे हैं या प्रशासन को फंड उपलब्ध करा रहे हैं। बाकी उद्योगों की भूमिका या तो शून्य है या फिर पूरी तरह संदिग्ध।
सीएसआर शाखा है, लेकिन असर नहीं
जिले में सीएसआर के लिए अलग शाखा का गठन तो किया गया है, लेकिन वर्षों से यह शाखा कंपनियों की जवाबदेही तय करने में नाकाम साबित हो रही है। नियमों के मुताबिक कंपनियों की बैलेंस शीट मंगवाकर उनका नेटवर्थ, टर्नओवर और शुद्ध लाभ का परीक्षण किया जाना चाहिए, ताकि यह तय हो सके कि वे सीएसआर के लिए कितनी राशि खर्च करेंगी। लेकिन यह प्रक्रिया कई सालों से ठंडे बस्ते में पड़ी है।
इसका नतीजा यह हुआ कि कंपनियां बिना किसी डर या दबाव के करोड़ों रुपये की सीएसआर राशि बचा ले जा रही हैं और समाज को उसका लाभ नहीं मिल पा रहा।
उद्योग विभाग ने झाड़े हाथ
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस उद्योग विभाग ने इन कंपनियों को जमीन लीज पर दी, वह खुद सीएसआर के मसले पर जिम्मेदारी लेने से बचता नजर आता है। जिला उद्योग केंद्र की जीएम अंजू नायक का साफ कहना है कि सीएसआर के लिए उनका विभाग अधिकृत नहीं है। न तो वे किसी उद्योग को नोटिस दे सकते हैं और न ही सीएसआर राशि जमा कराने का अधिकार रखते हैं। विभाग का काम केवल उद्योगों को सुविधा देना है।
यहीं से असली सवाल जन्म लेता है—अगर न उद्योग विभाग, न सीएसआर शाखा और न ही कोई अन्य प्रशासनिक इकाई जिम्मेदारी ले रही है, तो आखिर सीएसआर कानून का पालन कौन कराएगा?
जनता के हिस्से का पैसा, भगवान भरोसे
स्थिति यह है कि हर साल करोड़ों रुपये के सामाजिक कार्य सीएसआर के जरिए हो सकते थे, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता और निगरानी के अभाव में यह पैसा कागजों में ही अटका रह गया। कभी 8 करोड़ तो कभी 20 करोड़ की राशि मिलने की खबरें आती हैं, लेकिन उसका कोई स्थायी ढांचा या पारदर्शी तंत्र नजर नहीं आता।
रायगढ़ में सीएसआर आज एक नीति नहीं, बल्कि एक रहस्य बन चुका है—जहां पैसा है, कानून है, जरूरत भी है, लेकिन इच्छाशक्ति और जवाबदेही का घोर अभाव है। सवाल यह नहीं है कि उद्योग सीएसआर क्यों नहीं दे रहे, असली सवाल यह है कि प्रशासन कब तय करेगा कि समाज के हिस्से का यह पैसा अब और यूं ही लुटने नहीं दिया जाएगा।
यह स्वीकार करना होगा कि रायगढ़ जिले में एनटीपीसी और एसईसीएल ऐसे सार्वजनिक उपक्रम हैं, जो सीएसआर के तहत कार्य कर रहे हैं। स्कूल भवन, स्वास्थ्य शिविर, पेयजल, खेल सामग्री और कुछ बुनियादी ढांचे के काम इनके माध्यम से हुए हैं। लेकिन सवाल अब काम होने या न होने का नहीं, बल्कि काम की दिशा, प्राथमिकता और पारदर्शिता का है।
स्थानीय सामाजिक संगठनों और ग्रामीणों का कहना है कि एनटीपीसी और एसईसीएल का सीएसआर अधिकतर कागजी संतुलन तक सीमित रह गया है। जिन इलाकों से भूमि अधिग्रहित की गई, जहां प्रदूषण का सबसे अधिक प्रभाव पड़ा और जहां विस्थापन की पीड़ा झेली गई—वहीं आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की स्थिति बदहाल बनी हुई है।
प्रभावित गांव पीछे, फाइलों में आगे विकास
सीएसआर के मूल उद्देश्य के अनुसार, प्राथमिकता उन समुदायों को मिलनी चाहिए जो उद्योगों से सीधे प्रभावित हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई ऐसे गांव, जो एनटीपीसी और एसईसीएल परियोजनाओं के बिल्कुल समीप हैं, आज भी
शुद्ध पेयजल
स्थायी स्वास्थ्य सुविधा
गुणवत्तापूर्ण स्कूल
स्थानीय युवाओं के लिए कौशल विकास और रोजगार
जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सीएसआर राशि का उपयोग “जरूरत” के आधार पर हो रहा है या “सुविधा” के आधार पर?
सीएसआर या कॉर्पोरेट इमेज मैनेजमेंट?
आलोचकों का कहना है कि कई बार सीएसआर गतिविधियां जनहित से ज्यादा कॉर्पोरेट ब्रांडिंग बनकर रह जाती हैं। बड़े आयोजन, शिलान्यास, बोर्ड-फ्लेक्स और फोटो सेशन तो होते हैं, लेकिन दीर्घकालिक और संरचनात्मक समाधान नहीं दिखते।
यदि एनटीपीसी और एसईसीएल वास्तव में सामाजिक उत्तरदायित्व निभाना चाहते हैं, तो उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि—
सीएसआर परियोजनाएं स्थानीय ग्रामसभा की सहमति से तय हों
खर्च की सार्वजनिक सामाजिक ऑडिट रिपोर्ट जारी हो
प्रभावित गांवों के लिए अलग सीएसआर पैकेज हो
युवाओं के लिए स्थायी कौशल और रोजगार मॉडल बने
अच्छा काम करने वालों से ज्यादा अपेक्षा
एनटीपीसी और एसईसीएल इसलिए भी सवालों के घेरे में हैं, क्योंकि वे काम कर रहे हैं—और जब कोई संस्था काम करती है, तो उससे और बेहतर काम की अपेक्षा भी की जाती है। यही लोकतांत्रिक जवाबदेही है।
आज जरूरत इस बात की है कि ये सार्वजनिक उपक्रम केवल “बाकियों से बेहतर” होने पर संतोष न करें, बल्कि यह उदाहरण पेश करें कि सीएसआर कैसे सामाजिक परिवर्तन का औजार बन सकता है, न कि केवल औपचारिक दायित्व।
अब निगाहें शासन और इन उपक्रमों पर
रायगढ़ में सीएसआर का संकट केवल निजी उद्योगों की उदासीनता तक सीमित नहीं है। यह सवाल सार्वजनिक उपक्रमों की नीतिगत ईमानदारी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति से भी जुड़ा है।
अब यह देखना होगा कि
क्या एनटीपीसी और एसईसीएल अपने सीएसआर की खुली सामाजिक समीक्षा के लिए तैयार होंगे?
क्या शासन उनके माध्यम से एक मॉडल सीएसआर फ्रेमवर्क लागू करेगा?
क्योंकि जब बात जनता के हिस्से के पैसे की हो, तो कम काम भी सवालों के घेरे में आता है और अच्छा काम भी—जब तक वह पर्याप्त, पारदर्शी और न्यायसंगत न हो।