रायगढ़ में कोयला परियोजनाओं की दस्तक, लेकिन रोजगार और मुआवज़े पर गहराया संशय

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
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रायगढ़, 8 अप्रैल।
दक्षिण पूर्वी कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) द्वारा रायगढ़ क्षेत्र में प्रस्तावित नई कोयला परियोजनाओं को लेकर हलचल तेज़ हो गई है। दुर्गापुर, पेलमा और पोरड़ा-चिमटापानी जैसे अहम प्रोजेक्ट्स में पदस्थापना की प्रक्रिया शुरू होने से यह संकेत मिल रहा है कि कंपनी अब इन योजनाओं को ज़मीन पर उतारने के लिए सक्रिय हो चुकी है। लेकिन दूसरी ओर धरमजयगढ़ क्षेत्र, खासकर दुर्गापुर में, इस पूरी प्रक्रिया को लेकर असमंजस और आशंकाओं का माहौल भी कम नहीं है।
सूत्रों के अनुसार, कंपनी ने अपने अनुभवी कर्मचारियों से इन परियोजनाओं में तैनाती के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। यह कदम जहां प्रशासनिक स्तर पर परियोजनाओं को गति देने की तैयारी दर्शाता है, वहीं स्थानीय युवाओं के बीच रोजगार को लेकर नई बहस भी छेड़ रहा है।
जमीन और मुआवज़े पर अटका मामला
धरमजयगढ़ के ग्रामीण इलाकों में इन परियोजनाओं का सबसे बड़ा सवाल अब भी भूमि अधिग्रहण और मुआवज़ा ही बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक उनकी ज़मीन के उचित मूल्य और पुनर्वास की स्पष्ट व्यवस्था नहीं होती, तब तक किसी भी परियोजना की वास्तविक शुरुआत मान लेना जल्दबाज़ी होगी। गांव-गांव में बैठकों का दौर जारी है, जहां लोग अपने अधिकारों को लेकर सजग और संगठित नजर आ रहे हैं।
रोजगार को लेकर बढ़ी चिंता
इसी बीच कंपनी द्वारा पहले से कार्यरत कर्मचारियों को प्राथमिकता देने की खबरों ने स्थानीय बेरोजगार युवाओं की उम्मीदों पर असर डाला है। क्षेत्र के युवाओं का मानना है कि अगर नई परियोजनाओं में भी बाहरी या पहले से जुड़े कर्मचारियों को ही मौका दिया जाएगा, तो स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर सीमित हो जाएंगे।
एक स्थानीय युवक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, “जब हमारी जमीन ली जा रही है, तो नौकरी में भी हमें प्राथमिकता मिलनी चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता, तो यह हमारे साथ अन्याय होगा।”
विकास बनाम असमंजस
कुल मिलाकर स्थिति दोराहे पर खड़ी दिखाई देती है। एक तरफ कंपनी परियोजनाओं को तेज़ी से आगे बढ़ाने के संकेत दे रही है, वहीं दूसरी तरफ ज़मीनी स्तर पर कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। प्रशासन, कंपनी और ग्रामीणों के बीच संतुलन बनाना इस समय सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते संवाद और पारदर्शिता के साथ इन मुद्दों का समाधान नहीं किया गया, तो यह असमंजस आगे चलकर बड़े विवाद का रूप ले सकता है।
फिलहाल, धरमजयगढ़ की फिज़ा में विकास की आहट तो सुनाई दे रही है, लेकिन उसके साथ ही अनिश्चितता की गूंज भी उतनी ही तेज़ है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह परियोजनाएं स्थानीय लोगों के लिए अवसर बनती हैं या फिर एक नई चिंता का कारण।