राजस्व अदालतों की सुस्त रफ्तार: बंटवारा–सीमांकन के सैकड़ों मामले तारीखों में कैद, तमनार सबसे ज्यादा प्रभावित

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम रायगढ़।
जिले के राजस्व न्यायालयों में आम ग्रामीणों से जुड़े बुनियादी मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन निराकरण की रफ्तार बेहद धीमी बनी हुई है। स्थिति यह है कि बंटवारा और सीमांकन जैसे अपेक्षाकृत सरल माने जाने वाले प्रकरण भी महीनों तक तारीखों के बीच उलझे रहते हैं। कभी अधिकारी उपलब्ध नहीं होते, तो कभी बैठक, प्रशिक्षण, कार्यक्रम या वीआईपी दौरे के कारण सुनवाई टल जाती है।
नवंबर के अंत तक के आंकड़े प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं। अक्टूबर-नवंबर के दौरान जिले में बंटवारे के कुल 162 प्रकरण दर्ज किए गए, लेकिन इनमें से महज 35 मामलों का ही निराकरण हो सका। शेष 127 मामले अभी भी लंबित हैं। खास बात यह है कि गांवों में अधिकांश बंटवारे अविवादित होते हैं, जहां आपसी सहमति से जमीन का विभाजन किया जाना होता है। इसके बावजूद इन मामलों को कई-कई पेशियों तक खींचा जा रहा है।
सीमांकन के मामलों में भी तस्वीर कुछ अलग नहीं है। लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत तय समय-सीमा का पालन होता नजर नहीं आ रहा। पिछले दो महीनों में जिले भर में 463 सीमांकन प्रकरण दर्ज हुए, जिनमें से केवल 113 का निराकरण किया जा सका, जबकि 350 मामले लंबित पड़े हैं।
सबसे चिंताजनक स्थिति तमनार तहसील की है। यहां सीमांकन के 327 प्रकरण दर्ज किए गए थे, जिनमें से सिर्फ 101 मामलों का निपटारा हो सका। शेष 226 प्रकरण अब भी फाइलों में दबे हुए हैं। इससे न केवल ग्रामीणों की परेशानी बढ़ रही है, बल्कि भूमि से जुड़े अन्य प्रशासनिक कार्य भी प्रभावित हो रहे हैं।
कोल ब्लॉक क्षेत्रों में यह समस्या और गहरी होती दिख रही है। घरघोड़ा और तमनार जैसे इलाकों में कोयला परियोजनाओं के चलते मुआवजे की प्रक्रिया ने बंटवारे और सीमांकन के मामलों को और बढ़ा दिया है। मुआवजा पाने के लिए जमीन को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित करने की होड़ शुरू हो गई है, जिससे परिवारों के भीतर आपसी टकराव भी सामने आ रहे हैं। यही वजह है कि इन क्षेत्रों में राजस्व न्यायालयों पर दबाव अन्य तहसीलों की तुलना में कहीं अधिक है।
ग्रामीणों का कहना है कि बार-बार तारीख मिलने और सुनवाई टलने से उन्हें आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कई लोग खेती, मकान निर्माण या मुआवजा प्रक्रिया जैसे जरूरी फैसलों के लिए महीनों से इंतजार कर रहे हैं।
कुल मिलाकर हालात यह संकेत दे रहे हैं कि अगर राजस्व न्यायालयों की कार्यप्रणाली में सुधार नहीं किया गया और बंटवारा–सीमांकन जैसे मामलों को प्राथमिकता के आधार पर नहीं निपटाया गया, तो लंबित प्रकरणों का यह अंबार और बढ़ता जाएगा। सवाल यह है कि क्या प्रशासन समय रहते इस सुस्ती को दूर कर पाएगा, या फिर ग्रामीणों की यह बुनियादी समस्याएं यूं ही तारीखों की भेंट चढ़ती रहेंगी।