मीठी सुपारी की आड़ में ज़हर का साम्राज्य, दुर्ग से उठा अरबों का गुटखा घोटाला

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
दुर्ग (छत्तीसगढ़)।
तंबाकू युक्त गुटखे पर प्रतिबंध के बावजूद प्रदेश में फल-फूल रहा अवैध कारोबार एक बार फिर बेनकाब हुआ है। इस बार शिकंजा कसा है दुर्ग के चर्चित ‘सितार गुटखा’ कारोबारी गुरमुख जुमनानी पर, जिस पर जीएसटी विभाग ने अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए 317 करोड़ रुपये का भारी-भरकम टैक्स और जुर्माना ठोका है। यह कार्रवाई केवल एक कारोबारी पर नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र पर सवाल है जो वर्षों से कानून की आंखों में धूल झोंकते हुए ज़हर बेचता रहा।
जांच में सामने आया है कि गुरमुख जुमनानी बीते कई वर्षों से पूरे छत्तीसगढ़ में प्रतिबंधित तंबाकू युक्त गुटखे का संगठित नेटवर्क चला रहा था। मीठी सुपारी के नाम पर पैकिंग, अलग-अलग ठिकानों पर उत्पादन और रात के अंधेरे में सप्लाई—पूरा कारोबार किसी माफिया तंत्र से कम नहीं था। जीएसटी विभाग ने पिछले पांच वर्षों के लेन-देन और उत्पादन का आकलन करने के बाद ही यह जुर्माना तय किया है, जिससे अवैध कारोबार की भयावह तस्वीर सामने आती है।
जांच अधिकारियों के मुताबिक इस धंधे में केवल गुरमुख ही नहीं, बल्कि उसके परिवार के सदस्य भी सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। गोदामों के रेंट एग्रीमेंट गुरमुख के पिता के नाम पर कराए जाते थे, जहां गुप्त रूप से गुटखे की पैकिंग होती थी। छापेमारी के दौरान ऐसे कई पुराने एग्रीमेंट और संदिग्ध दस्तावेज बरामद हुए हैं, जो इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलते हैं।
और भी चौंकाने वाला खुलासा राजनांदगांव की कोमल फूड फैक्ट्री को लेकर हुआ है। कागजों में यह फैक्ट्री गुरमुख के बेटे सागर के नाम पर केवल मीठी सुपारी निर्माण के लिए दर्ज थी, लेकिन असलियत में यहीं प्रतिबंधित गुटखे का मसाला तैयार किया जा रहा था। इसके बाद माल दुर्ग के गनियारी और जोरातराई भेजा जाता, जहां मशीनों से पैकिंग कर बाजार में खपाया जाता था। यह अवैध खेल रोजाना रात 10 बजे से सुबह 7 बजे तक चलता था।
पूछताछ में गुटखे का फॉर्मूला तैयार करने वाले दीपक पांडे ने बताया कि फैक्ट्री की मशीनें एक मिनट में 250 पैकेट तैयार करने में सक्षम थीं। रोजाना करीब 50 बोरा गुटखा बाजार में उतारा जाता था। मजदूरों को छिंदवाड़ा के एक लेबर कॉन्ट्रैक्टर के जरिए बुलाया जाता और महीने में केवल 18 दिन काम लेकर उन्हें रवाना कर दिया जाता था—ताकि कोई स्थायी सुराग न छूटे।
कार्रवाई के दौरान यह तथ्य भी सामने आया कि जब खाद्य विभाग ने फैक्ट्री सील की थी, तब जुमनानी ने कथित तौर पर जबरन टीन शेड तोड़कर मशीनें और कीमती सामान बाहर निकलवा लिया। अधिकारियों को आशंका है कि पुलिस और खाद्य विभाग के भीतर बैठे कुछ लोगों की मिलीभगत से ही छापेमारी की सूचना समय से पहले जुमनानी तक पहुंच जाती थी, जिससे वह लंबे समय तक कानून से बचता रहा।
इस पूरे मामले ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जब एक ‘सितार गुटखा’ कारोबारी अरबों के अवैध कारोबार में पकड़ा गया है, तो प्रदेश और देश में राजश्री, विमल जैसे बड़े नामों के पीछे छिपी कमाई का आंकड़ा आखिर कितना होगा? यह कार्रवाई अगर किसी नतीजे तक पहुंचती है, तो शायद गुटखे के इस काले साम्राज्य पर पहली बार सच में चोट लगे। वरना इतिहास गवाह है—यह ज़हर नाम बदलकर फिर बाजार में लौट आता है।