“फाइलों के नीचे दबा सच: RTI की धाराओं ने खोला ‘कागजी विकास’ का काला चक्र”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़/लैलूंगा/घरघोड़ा।
रायगढ़ जिले की दो नगर पंचायतों—लैलूंगा और घरघोड़ा—में विकास के नाम पर जो ‘कागजी साम्राज्य’ खड़ा किया गया था, अब उसकी परतें एक-एक कर उधड़ने लगी हैं। यह कोई साधारण पड़ताल नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार (RTI) अधिनियम की धाराओं से लैस एक सर्जिकल स्ट्राइक है, जिसने सरकारी दफ्तरों की बंद अलमारियों में कैद फाइलों को कटघरे में ला खड़ा किया है।
11 फरवरी 2025 से अब तक हुए करोड़ों रुपये के निर्माण, स्वच्छता और सौंदर्यीकरण कार्य अब सिर्फ कागजों की कहानी नहीं रहेंगे—बल्कि दस्तावेजी सच्चाई के साथ सार्वजनिक जांच के दायरे में होंगे।
RTI की धाराओं का ‘सीधा प्रहार’: अब जवाब से बचना मुश्किल
इस पूरे प्रकरण की सबसे अहम कड़ी है RTI अधिनियम की वे धाराएं, जिनका सटीक और आक्रामक इस्तेमाल किया गया है।
धारा 6(1) के तहत मांगी गई सूचनाएं स्पष्ट, बिंदुवार और दस्तावेजी प्रमाण सहित हैं—यानी अब “सूचना अस्पष्ट है” जैसे बहाने नहीं चलेंगे।
धारा 7(1) के अनुसार 30 दिनों के भीतर जवाब देना बाध्यकारी है—देरी अब सीधे जवाबदेही में गिनी जाएगी।
धारा 2(f) और 2(j) के तहत न केवल दस्तावेज, बल्कि मेजरमेंट बुक (MB), तकनीकी स्वीकृति (TS), प्रशासकीय स्वीकृति (AS) और भुगतान से जुड़े रिकॉर्ड की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई हैं।
धारा 4(1)(b) का सीधा हवाला देते हुए यह भी पूछा गया है कि इतनी बड़ी योजनाओं की जानकारी पहले से सार्वजनिक क्यों नहीं की गई—क्या यह पारदर्शिता का उल्लंघन नहीं?
और सबसे अहम, धारा 20—यदि सूचना देने में लापरवाही या जानबूझकर जानकारी छिपाने की पुष्टि होती है, तो संबंधित जन सूचना अधिकारी पर प्रतिदिन ₹250 के हिसाब से जुर्माना, अधिकतम ₹25,000 तक, और विभागीय कार्रवाई तय है।
यानी यह RTI सिर्फ जानकारी मांगने का औपचारिक आवेदन नहीं, बल्कि कानून की धाराओं से लैस एक सुनियोजित ‘जवाबदेही अभियान’ है।
BNS-2023 का ‘क्रिमिनल एंगल’: अब गलती नहीं, अपराध माना जाएगा
मामले को और गंभीर बनाता है भारतीय न्याय संहिता (BNS)-2023 का समावेश।
स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि—
धारा 198 (झूठी जानकारी देना)
धारा 240 (रिकॉर्ड में हेरफेर/जालसाजी)
के तहत यदि दस्तावेजों में गड़बड़ी या भ्रामक जानकारी सामने आती है, तो यह केवल विभागीय चूक नहीं, बल्कि सीधा आपराधिक अपराध होगा।
जांच के घेरे में ‘विकास’ का पूरा खाका
दोनों नगर पंचायतों में एक जैसे पैटर्न पर सवाल उठाए गए हैं—
स्वच्छता मद का हिसाब: लाखों-करोड़ों की राशि खर्च होने के बावजूद जमीनी हकीकत क्या कहती है?
सौंदर्यीकरण या सांठगांठ? TS और AS के कागजों के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि स्वीकृत कार्य वास्तव में हुए भी या नहीं।
ठेकेदार नेटवर्क: किन फर्मों को बार-बार काम मिला? क्या गुणवत्ता जांच हुई या सिर्फ भुगतान पास होते गए?
मेजरमेंट बुक (MB): यही वह दस्तावेज है जो तय करेगा कि काम हुआ या सिर्फ दिखाया गया।
जिम्मेदारों पर सीधा निशाना
लैलूंगा के जन सूचना अधिकारी (सब इंजीनियर) गौरव कुमार अग्रवाल और घरघोड़ा के सहायक ग्रेड-3 शम्भू दयाल पटनायक को विधिवत नोटिस देकर 30 दिन की समयसीमा में जवाब देने को कहा गया है।
धारा 5(5) के तहत अब यह जिम्मेदारी सिर्फ एक अधिकारी की नहीं, बल्कि संबंधित पूरे विभाग की मानी जाएगी—यानी “मुझे जानकारी नहीं थी” अब वैध बचाव नहीं रहेगा।
वरिष्ठ पत्रकार की नजर से: यह सिर्फ RTI नहीं, सिस्टम की परीक्षा है
रायगढ़ जिले में विकास कार्यों की गुणवत्ता को लेकर सवाल नए नहीं हैं। लेकिन पहली बार किसी ने सिर्फ आरोप नहीं लगाए, बल्कि दस्तावेजों की मांग कर सीधे सिस्टम की जड़ों को चुनौती दी है।
यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि—
यहां कागज बनाम जमीनी हकीकत की सीधी टक्कर है
और फैसला फाइलें करेंगी, बयान नहीं
यदि मांगी गई सूचनाओं में गड़बड़ी सामने आती है, तो यह सिर्फ एक नगर पंचायत का मामला नहीं रहेगा—बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करेगा।
अंतिम सवाल जो सबके सामने है:
“क्या विकास सिर्फ फाइलों में हुआ, या वाकई जमीन पर भी दिखेगा?”
अब जवाब कागज देंगे… और यदि कागज चुप रहे, तो कानून बोलेगा।
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