धान तौल में खेल या सुनियोजित लूट? धान उपार्जन केंद्र पर किसानों का फूटा गुस्सा, प्रशासनिक संरक्षण के गंभीर आरोप

Freelance editor Amardeep chauhan @http://amarkhabar.com
रायगढ़/पुसौर।
रायगढ़ विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत तहसील पुसौर स्थित पडिगांव धान उपार्जन केंद्र इन दिनों किसानों के आक्रोश और सवालों के केंद्र में है। यहां जो तस्वीर सामने आ रही है, वह केवल एक केंद्र की अनियमितता नहीं, बल्कि पूरी धान खरीदी व्यवस्था की साख पर सीधा सवाल खड़ा करती है। किसानों का आरोप है कि शासन द्वारा तय मापदंडों को दरकिनार कर, तौल से अधिक धान दर्ज किया जा रहा है और यह सब नोडल अधिकारी से लेकर तहसील व जिला स्तर तक के जिम्मेदार अफसरों की कथित मिलीभगत से हो रहा है।
किसानों के अनुसार, उपार्जन केंद्र में तौल के दौरान मशीन पर वास्तविक वजन से अधिक धान दर्ज किया जाता है। जब कोई किसान इस पर आपत्ति जताता है, तो उसे खरीदी बंद कर देने या बार-बार परेशान करने की चेतावनी दी जाती है। मजबूरी में किसान या तो गलत तौल को स्वीकार कर रहे हैं, या फिर अपनी उपज वापस ले जाने को विवश हो रहे हैं। भय और दबाव का यह माहौल इतना गहरा है कि कई किसान खुलकर सामने आने से भी डर रहे हैं।

मामला यहीं नहीं थमता। किसानों का कहना है कि उनसे केवल “सरना धान” लाने का दबाव बनाया जा रहा है, जबकि शासन के नियमों में ऐसी कोई अलग-थलग व्यवस्था नहीं है। यह सवाल लगातार गूंज रहा है कि जब धान खरीदी के स्पष्ट गुणवत्ता मानक और प्रक्रियाएं पहले से तय हैं, तो पडिगांव केंद्र में अलग नियम क्यों? क्या यह किसी बड़े खेल की भूमिका है, जिसमें किसानों की मेहनत को चुपचाप निचोड़ा जा रहा है?
स्थानीय जागरूक नागरिकों और किसान संगठनों का मानना है कि यदि शासन स्तर से निष्पक्ष और ईमानदार जांच कराई जाए, तो लाखों रुपये के घोटाले की परतें खुल सकती हैं। तौल मशीनों की तकनीकी जांच, स्टॉक रजिस्टर का मिलान, परिवहन और उठाव के रिकॉर्ड की पड़ताल—ये सब कदम इस पूरे मामले की सच्चाई उजागर कर सकते हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल जिला प्रशासन की भूमिका को लेकर उठ रहा है। क्या प्रशासन इन गंभीर आरोपों को महज अफवाह मानकर नजरअंदाज करेगा, या फिर किसानों के हित में सख्त कार्रवाई करेगा? यदि समय रहते जांच नहीं हुई, तो यह मामला केवल पडिगांव तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे जिले की धान खरीदी व्यवस्था पर स्थायी सवालिया निशान बन जाएगा।
किसानों की निगाहें अब प्रशासन और शासन पर टिकी हैं—न्याय की उम्मीद में, या फिर एक और अनसुनी कहानी बनने की आशंका के साथ।
News associate Sikandar Chauhan