धरमजयगढ़ से उठी चेतावनी: पुरूंगा कोल ब्लॉक के खिलाफ जनसैलाब

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम धरमजयगढ़ (रायगढ़)।
दशहरा मैदान आज केवल एक सभा स्थल नहीं रहा, बल्कि वह चेतावनी का मंच बन गया—ऐसी चेतावनी की आने वाले दिनों में हालात और गंभीर हो सकते हैं। जल–जंगल–ज़मीन बचाओ के नारे के साथ पुरूंगा कोल ब्लॉक के विरोध में आयोजित विशाल रैली और आमसभा ने साफ संकेत दे दिया कि अब यह आंदोलन प्रतीकात्मक नहीं, निर्णायक मोड़ पर है।
आज सभा में जुटेगा जनसमूह—ग्रामीण, आदिवासी समाज, महिलाएं और युवा—इस बात का प्रमाण था कि यह असंतोष किसी एक गांव या मुद्दे तक सीमित नहीं है। मंच पर उभरे हाथी, भालू और हिरण के प्रतीक यह बताने के लिए काफी थे कि संघर्ष केवल हाथी बचाव या किसी एक वन्यजीव तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा से जुड़ा है।
वक्ताओं ने दो टूक कहा कि विकास के नाम पर विनाश की नीति अब स्वीकार्य नहीं है। “पेसा कानून लागू करो”, “वन अधिकार अधिनियम का सम्मान करो” और “जल–जंगल–ज़मीन पर पहला हक ग्रामसभा का” जैसे नारों ने यह साफ कर दिया कि आंदोलन की वैचारिक जमीन मजबूत है और लोग कानूनी अधिकारों से भली-भांति परिचित हैं।
तमनार की घटनाओं का जिक्र करते हुए वक्ताओं ने आगाह किया कि जनभावनाओं की अनदेखी का परिणाम टकराव के रूप में सामने आता है। उनका कहना था कि अगर समय रहते संवाद, सहमति और संवैधानिक प्रावधानों का पालन नहीं हुआ, तो हालात हाथ से निकल सकते हैं—जिसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर शासन-प्रशासन पर होगी।
आंदोलनकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि यह विरोध किसी कंपनी, शासन प्रशासन या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि उस सोच के खिलाफ है जो जंगल को सिर्फ संसाधन और आदिवासी समाज को बाधा मानती है। “जब पानी सूख जाएगा, जंगल कट जाएंगे और जमीन उजड़ जाएगी, तब न उद्योग बचेगा, न इंसान”—यह वाक्य सभा में बार-बार गूंजता रहा।
पुरूंगा कोल ब्लॉक को लेकर उठी यह आवाज अब स्थानीय विरोध नहीं रही। यह एक स्पष्ट संदेश है कि पेसा कानून और वन अधिकार अधिनियम को दरकिनार कर कोई भी परियोजना आगे नहीं बढ़ेगी। दशहरा मैदान से यह हुंकार आने वाले दिनों में प्रशासन के नीति की असली परीक्षा लेने वाली है।
अब सवाल सिर्फ इतना है—क्या धरमजयगढ़ से उठी इस शांत लेकिन दृढ़ चेतावनी को भी अनसुना कर दिया जायेगा? जवाब जल्द ही ज़मीन पर दिखाई देगा।