“कानून के कटघरे में पुलिस की भूमिका: तमनार प्रकरण में आरोपी के जुलूस पर उठे गंभीर सवाल, पिता को ‘न्याय’ दिलाने कलेक्ट्रेट पहुंची बेटी”

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम
रायगढ़ | 8 जनवरी 2026
तमनार थाना क्षेत्र में महिला आरक्षक के साथ हुए अभद्र व्यवहार की घटना अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। इस मामले के मुख्य आरोपी चित्रसेन साव को न्यायालय में पेश करने से पहले पुलिस द्वारा सार्वजनिक रूप से जुलूस निकालने की कार्रवाई ने न केवल कानूनी बल्कि नैतिक बहस को भी जन्म दे दिया है। आरोपी की पुत्री पूनम साव ने इसे अमानवीय और संविधान विरोधी बताते हुए पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं।
गुरुवार को पूनम साव अपने परिजनों के साथ जिला मुख्यालय पहुंचीं और कलेक्टर के नाम ज्ञापन सौंपकर जुलूस निकालने वाले जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। इसके साथ ही, उन्होंने अपने अधिवक्ता के माध्यम से छत्तीसगढ़ राज्य मानव अधिकार आयोग को भी शिकायत पत्र प्रेषित किया है।
पूनम का कहना है कि उनके पिता को गिरफ्तार करने के बाद हेमू कलानी चौक से कलेक्ट्रेट तक जिस तरह अर्धनग्न अवस्था में पैदल मार्च कराया गया, जूते-चप्पलों की माला पहनाई गई, चूड़ी-बिंदी और लिपस्टिक लगाई गई—वह न केवल अपमानजनक है बल्कि कानून के शासन की मूल भावना के भी खिलाफ है। उनका तर्क है कि किसी आरोपी को दंडित करने का अधिकार केवल न्यायालय को है, पुलिस को नहीं।
परिजनों का यह भी कहना है कि इस सार्वजनिक अपमान का गहरा मानसिक प्रभाव पड़ सकता है। यदि भविष्य में चित्रसेन साव की मानसिक स्थिति बिगड़ती है या वह किसी अप्रिय या हिंसक घटना का शिकार होता है, तो इसकी जिम्मेदारी संबंधित पुलिस अधिकारियों की होगी।
गौरतलब है कि 27 दिसंबर को तमनार में जनसुनवाई के विरोध के दौरान हुई हिंसक झड़प में एक महिला आरक्षक के साथ मारपीट और उसके कपड़े फाड़े जाने की घटना सामने आई थी। इस मामले में तमनार थाने में एफआईआर दर्ज कर अब तक छह आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि एक अन्य आरोपी की तलाश जारी है। महिला आरक्षक के साथ हुई घटना की चौतरफा निंदा हुई है और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग भी उठी है।
इस पूरे प्रकरण पर आरोपी के अधिवक्ता राजीव कालिया ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महिला आरक्षक के साथ जो हुआ वह निंदनीय है और उस पर कानून के मुताबिक सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस स्वयं न्यायाधीश की भूमिका में आ जाए। उन्होंने कहा कि चित्रसेन साव के साथ की गई सार्वजनिक और सामाजिक दंडात्मक कार्रवाई अपने आप में मानवाधिकारों का उल्लंघन है और संविधान के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।
अब यह मामला केवल एक आपराधिक घटना तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पुलिस की कार्यशैली, आरोपी के अधिकार और कानून के दायरे को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। छत्तीसगढ़ राज्य मानव अधिकार आयोग में की गई शिकायत के बाद यह देखना अहम होगा कि आयोग इस पर क्या रुख अपनाता है और क्या पुलिस की इस कार्रवाई की विधिक समीक्षा होती है या नहीं।
सम्पादकीय
चूड़ी–बिंदी–लिपस्टिक: अपमान या हमारी सामंती सोच का आईना?
एक तस्वीर… एक दृश्य… और उसके साथ जुड़ा शोर।
किसी आरोपी को पुलिस ने चूड़ी, बिंदी और लिपस्टिक लगाकर जुलूस में घुमाया—और देखते ही देखते यह कहा जाने लगा कि उसे “अपमानित” किया गया। सवाल यह नहीं है कि पुलिस को यह अधिकार था या नहीं—वह प्रश्न कानून तय करेगा। असली सवाल कहीं गहराई में है:
क्या चूड़ी, बिंदी और लिपस्टिक आज भी अपमान का प्रतीक हैं?
क्या स्त्री होना अब भी कमजोरी, तिरस्कार और दंड का रूपक बना हुआ है?
यह सोच समझ से परे है—और उतनी ही खतरनाक भी।
हम एक ओर महिला सशक्तिकरण की बातें करते हैं, बेटियों के आत्मसम्मान पर भाषण देते हैं, नारी शक्ति को राष्ट्र निर्माण की धुरी बताते हैं, और दूसरी ओर जब किसी पुरुष को “अपमानित” करना होता है तो उसे स्त्री के प्रतीकों में ढाल दिया जाता है। यह विरोधाभास नहीं, बल्कि हमारे समाज की जड़ जमाई मानसिकता का खुला प्रदर्शन है।
चूड़ी, बिंदी और लिपस्टिक कोई गाली नहीं हैं।
ये श्रृंगार हैं—संस्कृति हैं—आत्म-अभिव्यक्ति हैं।
लेकिन समस्या यह है कि हमने इन्हें स्त्रीत्व से जोड़ा और फिर स्त्रीत्व को ही हीनता का पर्याय बना दिया।
यह संदेश बेहद खतरनाक है।
जब किसी पुरुष को “सज़ा” देने के लिए स्त्री के प्रतीकों का उपयोग किया जाता है, तो अनकहा संदेश यह जाता है कि स्त्री होना स्वयं में दंड है। यह न केवल महिलाओं का अपमान है, बल्कि उस संवैधानिक सोच का भी अपमान है जो समानता की बात करती है।
यह तर्क कि “इससे आरोपी का अपमान हुआ”—अपने आप में महिलाओं के सम्मान पर सवाल खड़ा करता है।
यदि चूड़ी-बिंदी पहनना अपमान है, तो फिर उन्हें पहनने वाली करोड़ों महिलाएं क्या हैं?
क्या वे रोज़ अपमान ढो रही हैं?
सच यह है कि अपमान चूड़ी-बिंदी में नहीं, नज़रिये में है।
अपमान लिपस्टिक में नहीं, लिंग आधारित सोच में है।
अपमान उस मानसिकता में है, जो अब भी मानती है कि ताकत मर्दानगी में है और स्त्रीत्व कमजोरी में।
यह भी विडंबना है कि जिस घटना की जड़ में एक महिला आरक्षक के साथ हिंसा और अपमान जुड़ा है, उसी प्रकरण में स्त्री के प्रतीकों को दंड का औज़ार बनाकर पेश किया गया। इससे न्याय की भावना मजबूत नहीं होती, बल्कि भ्रमित होती है।
कानून का काम सज़ा देना है—तमाशा करना नहीं।
और समाज का काम है—गलत पर सवाल उठाना, लेकिन सोच को भी परखना।
आज ज़रूरत इस बात की है कि हम पूछें—
क्या हम सच में आधुनिक हो पाए हैं?
या सिर्फ नारों में आगे बढ़े हैं, सोच में अब भी पिछड़े हैं?
जब तक चूड़ी-बिंदी-लिपस्टिक को अपमान माना जाएगा,
तब तक “नारी सम्मान” सिर्फ पोस्टर और भाषणों तक सीमित रहेगा।
शायद अब वक्त है कि हम यह स्वीकार करें—
स्त्री होना अपमान नहीं है, और उसे अपमान की भाषा बनाना सभ्यता की हार है।