तहसील में रिश्वत का खेल बेनकाब: अतिरिक्त तहसीलदार और पटवारी ACB के ट्रैप में, 35 हजार लेते ही दबोचे गए

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
जांजगीर–चांपा।
सरकारी दफ्तरों में पसरे भ्रष्टाचार पर एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की यह कार्रवाई भले ही एक बड़ी सफलता के रूप में सामने आई हो, लेकिन पामगढ़ तहसील की यह घटना कोई अकेला मामला नहीं है। छत्तीसगढ़ के लगभग हर जिले में राजस्व विभाग को लेकर यही चर्चा है—कहीं कार्रवाई हो जाती है, कहीं मामला मीडिया में आकर दब जाता है, और कहीं सब कुछ चुपचाप चलता रहता है।
सूत्रों से लगातार मिल रही जानकारियाँ बताती हैं कि राजस्व विभाग में रिश्वतखोरी का यह खेल दशकों पुराना है। नामांतरण, सीमांकन, फसल रिकॉर्ड, मुआवजा, धान उपार्जन जैसे आम नागरिक से जुड़े कामों में “काम के बदले कीमत” एक तरह से अलिखित नियम बन चुका है। फर्क सिर्फ इतना है कि कभी कोई शिकायत कर देता है और मामला उजागर हो जाता है, वरना अधिकांश प्रकरण फाइलों के बीच ही दफन हो जाते हैं।
कार्रवाई व्यक्ति तक, समस्या व्यवस्था में
पामगढ़ मामले में भी वही पुराना पैटर्न दिखता है—शिकायत आई, सत्यापन हुआ, ट्रैप लगा और गिरफ्तारी हो गई। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे सिस्टम बदलेगा?
अब तक की अधिकतर कार्रवाइयाँ शिकायत आधारित रही हैं। जो शिकायत करता है, वह जोखिम उठाता है; जो नहीं करता, वह सिस्टम का हिस्सा बनकर चुप रहता है। नतीजा यह कि एक-दो नाम सामने आते हैं, लेकिन पूरी श्रृंखला जस की तस बनी रहती है।
राजस्व विभाग: सबसे संवेदनशील, सबसे बदनाम
राजस्व विभाग वह कड़ी है, जिससे किसान, मजदूर, जमीन मालिक—हर तबका सीधे जुड़ा है। यहां अगर भरोसा टूटता है, तो शासन की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है। यही वजह है कि पामगढ़ की यह कार्रवाई केवल एक गिरफ्तारी नहीं, बल्कि पूरे तंत्र पर सवाल खड़े करती है।
अब सवाल ACB और सरकार से
क्या एसीबी सिर्फ शिकायत आने का इंतजार करेगी?
क्या सरकार हर बार मीडिया में मामला आने के बाद ही जागेगी?
जरूरत इस बात की है कि:
ACB को स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेकर समय-समय पर राजस्व कार्यालयों की जांच करनी चाहिए
बिना शिकायत के भी संदिग्ध कार्यप्रणाली पर निगरानी और ट्रैप की व्यवस्था हो
संवेदनशील पदों पर वर्षों से जमे अधिकारियों की नियमित रोटेशन नीति लागू हो
सिस्टम बदले बिना नतीजा नहीं
अगर नामांतरण, सीमांकन और अन्य सेवाओं को पूरी तरह डिजिटल, समयबद्ध और जवाबदेह नहीं बनाया गया, तो रिश्वत का रास्ता बंद नहीं होगा। साथ ही, अधिकारियों की आय और संपत्ति की पीरियॉडिक जांच को औपचारिकता नहीं, वास्तविक हथियार बनाना होगा।
कार्रवाई अपवाद नहीं, नियम बने
पामगढ़ की घटना ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि समस्या किसी एक तहसील या दो अधिकारियों तक सीमित नहीं है। यह एक जड़ जमाई हुई व्यवस्था है, जिसे तोड़ने के लिए प्रतीकात्मक कार्रवाई नहीं, बल्कि निरंतर और संस्थागत जांच की जरूरत है।
आज सवाल यह नहीं है कि कौन पकड़ा गया—
असल सवाल यह है कि कितने अब भी पकड़े जाने से बाहर हैं?
जब तक इस सवाल का ईमानदार जवाब ढूंढने की इच्छाशक्ति नहीं होगी, तब तक ऐसी खबरें आती रहेंगी… और व्यवस्था वैसी ही बनी रहेगी।