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तमनार से रायपुर तक तस्करी की जड़ें: तमनार के महलोई में “पुष्पा स्टाइल” लकड़ी सिंडिकेट का भंडाफोड़ (देखें वीडियो)

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़। तमनार वन परिक्षेत्र एक बार फिर अवैध लकड़ी तस्करी के संगठित नेटवर्क का केंद्र बनकर सामने आया है। फिल्मी अंदाज़ में, पूरी प्लानिंग के सहारे चल रहे “पुष्पा स्टाइल” लकड़ी तस्करी सिंडिकेट का खुलासा उस समय हुआ, जब स्थानीय ग्रामीणों की सतर्कता के बाद वन विभाग की टीम ने मौके पर पहुँचकर कार्रवाई की।

तस्करी स्थल निरिक्षण करती संयुक्त टीम

सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, सेमल लकड़ी की आड़ में खैर एवं अन्य बेस कीमती लकड़ियों की अवैध तस्करी लंबे समय से की जा रही थी। यह लकड़ी तमनार के महलोई क्षेत्र से लोड कर रायपुर भेजी जा रही थी। वन विभाग द्वारा जब्त किया गया वाहन आइचर कंपनी का मेटाडोर, पंजीयन क्रमांक सीजी 04 एनयू 9100, बताया गया है, जो शक्ति जिले से तमनार क्षेत्र में दाखिल हुआ था।

सेमल के कागज, खैर की हकीकत

वन विभाग की प्रारंभिक जांच में यह साफ हो गया कि दस्तावेज़ों में दर्शाई गई सेमल लकड़ी के पीछे असली खेल खैर और अन्य कीमती प्रजातियों का था। तस्करी स्थल पर कई खैर के पेड़ों के ठूँठ, कटे हुए लट्ठे और अवशेष पाए गए हैं, जो बड़े पैमाने पर अवैध कटाई की ओर इशारा करते हैं।
तस्करों ने जानबूझकर सामान्य प्रजाति की लकड़ी का उल्लेख कर वन विभाग को गुमराह करने की कोशिश की, लेकिन मौके के साक्ष्यों ने उनकी पूरी कहानी उजागर कर दी।

पर्दे के पीछे कौन चला रहा है खेल?

जानकारी के मुताबिक, वाहन को लैलूंगा के पिपराही गांव निवासी विजय मिंज लेकर आया था, जो वन विभाग के अधिकारियों द्वारा पूछताछ शुरू करने से पहले ही मौके से फरार हो गया।
सूत्र बताते हैं कि विजय मिंज किसी पुष्पराज भाठिया नामक तस्कर के लिए काम कर रहा था और यह पूरा मामला एक संगठित सिंडिकेट के तहत संचालित हो रहा था। बताया जा रहा है कि पुष्पराज भाठिया पहले भी इस क्षेत्र से दर्जनों बार विभिन्न किस्म की बहुमूल्य लकड़ियों की तस्करी कर चुका है, लेकिन हर बार कानून की पकड़ से बच निकलने में सफल रहा।

अनुमति नहीं, एनओसी भी शक के घेरे में

इस पूरे प्रकरण में सबसे गंभीर पहलू यह है कि लकड़ी परिवहन के लिए वन विभाग से कोई वैध अनुमति नहीं ली गई थी। इसके साथ ही महलोई पंचायत के सरपंच द्वारा जारी एनओसी भी अब संदेह के घेरे में आ गई है।
वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि एनओसी की वैधता, जारी करने की प्रक्रिया और इसके पीछे संभावित भूमिका की गहन जांच की जाएगी।

फारेस्ट रेंजर विक्रांत सिंह (तमनार)

ग्रामीणों की सतर्कता से टूटा खेल

यदि स्थानीय ग्रामीण समय रहते सूचना नहीं देते, तो यह तस्करी की खेप भी आसानी से रायपुर पहुँच जाती। ग्रामीणों की जागरूकता के कारण ही वन विभाग और मीडिया की टीम मौके पर पहुँची और यह कार्रवाई संभव हो सकी। इस पूरे घटनाक्रम में स्थानीय लोगों की भूमिका सराहनीय मानी जा रही है।

कई सवाल, एक बड़ा सच

यह मामला सिर्फ एक वाहन की जब्ती नहीं, बल्कि तमनार के जंगलों में वर्षों से चल रहे अवैध कारोबार की ओर इशारा करता है।
सवाल साफ हैं—

आखिर इतने बड़े स्तर पर तस्करी करने वाले लोग अब तक बेखौफ कैसे सक्रिय हैं?

क्या स्थानीय स्तर पर मिलीभगत के बिना ऐसा सिंडिकेट पनप सकता है?

और सबसे अहम, आखिर कब तक जंगलों को लूटने वाले ऐसे तस्कर कानून से बचते रहेंगे?


फिलहाल वन विभाग ने वाहन जब्त कर जांच तेज कर दी है और फरार आरोपी की तलाश जारी है। अब देखना यह होगा कि यह कार्रवाई सिर्फ फाइलों तक सीमित रहती है या वास्तव में तमनार के जंगलों को नुकसान पहुँचा रहे “पुष्पा स्टाइल” तस्करों पर निर्णायक प्रहार साबित होती है।

News associate Surendra patnaik

Amar Chouhan

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