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तमनार की आवाज़ बना एक जनप्रतिनिधि — सत्ता, संसाधन और संविधान के टकराव में रूपेश पटेल की निर्भीक पहल

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़ जिले का तमनार विकासखंड इन दिनों केवल कोयला खदानों के लिए नहीं, बल्कि संविधान, आदिवासी अधिकार और लोकतांत्रिक मूल्यों की अग्निपरीक्षा के लिए चर्चा में है। गारे–पेलमा सेक्टर-01 कोल ब्लॉक को लेकर उपजा विवाद अब किसी एक औद्योगिक परियोजना का विषय नहीं रहा, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या विकास के नाम पर कानून, सहमति और मानव जीवन को दरकिनार किया जा सकता है?

इसी उथल-पुथल के बीच विधायक प्रतिनिधि एवं तमनार विकासखंड कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष रूपेश पटेल का सामने आना केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार जनप्रतिनिधि की संवैधानिक भूमिका का उदाहरण बनकर उभरा है। उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय, महामहिम राज्यपाल और मुख्यमंत्री जैसे सर्वोच्च संवैधानिक पदों को पत्र लिखकर 27 दिसंबर 2025 की घटनाओं की उच्चस्तरीय न्यायिक जाँच की मांग की है। यह पहल बताती है कि तमनार में उठी आवाज़ को उन्होंने सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने का साहस दिखाया है।

जब कानून को दरकिनार कर दी गई ग्रामसभा

तमनार एक आदिवासी बहुल क्षेत्र है, जहाँ संविधान की पाँचवीं अनुसूची और पेसा अधिनियम केवल औपचारिक कानून नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की सुरक्षा की ढाल हैं। आरोप है कि इन्हीं कानूनों को नजरअंदाज कर, बिना ग्रामसभा की विधिवत सहमति और अनुशंसा के, जिंदल प्रबंधन को कोल ब्लॉक आवंटित कर दिया गया।

रूपेश पटेल ने अपने पत्र में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि 8 दिसंबर 2025 को प्रस्तावित जनसुनवाई न तो नियत स्थल पर हुई और न ही पारदर्शी तरीके से। कथित तौर पर जनसुनवाई को किसी अन्य स्थान पर ‘दिखा’ कर कागज़ी खानापूर्ति कर दी गई। यह आरोप सीधे-सीधे प्रशासनिक निष्पक्षता और लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगाता है।

27 दिसंबर : जब विरोध कुचलने की कोशिश हुई

5 दिसंबर से शांतिपूर्ण धरने पर बैठे ग्रामीणों की मांगें स्पष्ट थीं—कानून का पालन हो, ग्रामसभा की सुनी जाए। लेकिन 27 दिसंबर को हालात अचानक बदल गए। पुलिस संरक्षण में कोयला लदे वाहनों को धरना स्थल से निकालने का प्रयास हुआ। ग्रामीणों ने विरोध किया और इसी अफरा-तफरी में खुरूसलेंगा गांव के एक बुजुर्ग की ट्रक की चपेट में आने से मौत हो गई।

यह केवल एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि उस अविश्वास की परिणति थी, जो प्रशासन और जनता के बीच गहराता जा रहा है। इस घटना ने पूरे तमनार क्षेत्र को झकझोर दिया और जनआक्रोश खुलकर सामने आ गया।

जनआंदोलन को बदनाम करने की आशंका

प्लांट में हुई तोड़फोड़ और आगजनी को लेकर भी रूपेश पटेल ने गंभीर शंका जाहिर की है। उनका कहना है कि यह सब स्वतःस्फूर्त जनआक्रोश नहीं, बल्कि जनआंदोलन को बदनाम करने की साजिश भी हो सकती है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा है कि घटना के समय वे अपने कार्यालय में मौजूद थे और इसका प्रमाण CCTV फुटेज के रूप में उपलब्ध है।

यह बयान केवल आत्मरक्षा नहीं, बल्कि निष्पक्ष जाँच की मांग को और मजबूत करता है।

महिला सम्मान और निष्पक्ष न्याय की मांग

पत्र में एक महिला आरक्षक के साथ हुई निंदनीय घटना का भी उल्लेख है। रूपेश पटेल ने मांग की है कि इस प्रकरण में वास्तविक दोषियों को चिन्हित कर कड़ी कार्रवाई की जाए, ताकि न तो महिला सम्मान पर आंच आए और न ही निर्दोषों को राजनीतिक या प्रशासनिक प्रतिशोध का शिकार बनाया जाए। यह रुख बताता है कि वे किसी भी तरह की हिंसा या अपराध का समर्थन नहीं, बल्कि निष्पक्ष न्याय के पक्षधर हैं।

तमनार की आवाज़, सत्ता के दरवाज़े तक

आज जब कई जनप्रतिनिधि विवादों से दूरी बनाना बेहतर समझते हैं, ऐसे समय में रूपेश पटेल का खुलकर सामने आना और संवैधानिक संस्थाओं को संबोधित करना उनकी राजनीतिक परिपक्वता और नैतिक साहस को दर्शाता है। उनके अनुसार, वीडियो साक्ष्य और CCTV फुटेज पूरे घटनाक्रम की सच्चाई सामने लाएंगे।

अब सवाल शासन से है—
क्या तमनार को न्यायिक जाँच की रोशनी मिलेगी?
क्या आदिवासी अधिकार और पेसा कानून केवल फाइलों में सिमट कर रह जाएंगे, या ज़मीन पर भी लागू होंगे?

इन सवालों के बीच इतना तय है कि तमनार की लड़ाई को एक स्पष्ट, मुखर और संवैधानिक आवाज़ मिल चुकी है। और यह आवाज़ अगर सुनी गई, तो यह केवल तमनार नहीं, बल्कि पूरे छत्तीसगढ़ में लोकतांत्रिक भरोसे की एक नई मिसाल बन सकती है।

News associate Amardeep chauhan

Amar Chouhan

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