जल-जंगल-ज़मीन की कीमत पर विकास? मैदानी से पहाड़ी छत्तीसगढ़ तक फैलता प्रदूषण का ज़हर
Freelance editor Amardeep chauhan @ amarkhabar.com

उद्योगों का धुआँ, सरकार की ख़ामोशी और छत्तीसगढ़ की साँसों पर संकट
छत्तीसगढ़ आज एक ऐसे दौर में खड़ा है, जहाँ औद्योगिक विकास का शोर पर्यावरण की कराह को पूरी तरह दबा चुका है। रायगढ़, कोरबा, रायपुर, सिलतरा, दुर्ग, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा से लेकर गेरवानी, तराईमाल, पूंजीपथरा, तमनार, घरघोड़ा और सरगुजा से बस्तर तक—समूचा प्रदेश उद्योगों से निकलने वाले दूषित जल, फ्लाइऐश, ठोस कचरे और ज़हरीली हवा की चपेट में है।
विडंबना यह है कि इतने व्यापक संकट के बावजूद सरकार के पास न कोई ठोस कार्ययोजना दिखती है, न ही इच्छाशक्ति। हालात ऐसे हैं मानो उद्योगों ने शासन-प्रशासन को घुटनों पर ला दिया हो।
शहर से गाँव तक कालिख की चादर
कारखानों से उड़ती राख और धुएँ ने जल, जंगल और ज़मीन के साथ-साथ पूरे प्राणी जगत को प्रभावित किया है। शहरों और गाँवों के घर, स्कूल, अस्पताल—सब पर धूल और कालिख की मोटी परत जम चुकी है। जैव विविधता को अपूरणीय क्षति पहुँची है। वनस्पतियाँ दम तोड़ रही हैं, सूक्ष्म जीव-जंतुओं की सैकड़ों प्रजातियाँ या तो विलुप्त हो चुकी हैं या विलुप्ति के कगार पर हैं।
नदी-नाले, तालाब और जलस्रोत कारखानों के रसायनों और राख से प्रदूषित हो चुके हैं। उद्योगों से निकलने वाला दूषित जल और फ्लाइऐश सीधे या परोक्ष रूप से महानदी में डाला जा रहा है—वही महानदी, जो छत्तीसगढ़ और ओडिशा की जीवनरेखा है। इसके जलीय जीवों की अनेक प्रजातियाँ समाप्त हो चुकी हैं, लेकिन सरकार की ओर से कोई ठोस हस्तक्षेप नज़र नहीं आता।
कानून सिर्फ़ काग़ज़ों में
छत्तीसगढ़ में कई औद्योगिक इकाइयाँ संविधान और पर्यावरण कानूनों की खुलेआम अवहेलना कर रही हैं। जवाबदेही के नाम पर कभी-कभार 50 हजार या एक लाख रुपये का जुर्माना लगाकर औपचारिकता पूरी कर ली जाती है। इसके बाद वही प्रदूषण, वही शोषण और वही लूट जारी रहती है।
यह स्थिति तब और चिंताजनक लगती है, जब हम दुनिया के अन्य देशों से तुलना करते हैं।

विदेश में कानून, यहाँ समझौता
यूरोप के देशों में प्रदूषण को लेकर कोई समझौता नहीं होता। नीदरलैंड (हॉलैंड) में टाटा कंपनी के स्टील प्लांट से वायु प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर वहाँ की सरकार ने लगभग 13 हजार करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया। कारण साफ था—AQI तय सीमा से ऊपर चला गया था।
यूरोपीय मानकों के अनुसार PM 2.5 की मात्रा 25 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। सीमा पार होते ही जुर्माना, जेल और यहां तक कि उद्योग बंद करने की कार्रवाई तक होती है।
PM 2.5 चार सौ पार, फिर भी चुप्पी
इसके उलट छत्तीसगढ़ और देश के कई औद्योगिक क्षेत्रों में PM 2.5 का स्तर 400 के पार पहुँच चुका है—जो सीधे तौर पर जानलेवा श्रेणी में आता है। इसके बावजूद न तो उद्योगों पर ताले लगते हैं, न ही जिम्मेदारों पर कार्रवाई होती है।
परिणाम सामने है—भारत में हर साल 17 लाख से अधिक मौतें सीधे वायु प्रदूषण से जुड़ी हैं। डायरिया, पीलिया, मलेरिया, डेंगू, कैंसर, फेफड़े और किडनी की बीमारियाँ—इन सबका रिश्ता कहीं न कहीं इसी प्रदूषित हवा और पानी से है।
कौन बचाएगा छत्तीसगढ़ को?
आज सवाल यह है कि छत्तीसगढ़ को अंबानी, अडानी, जिंदल, वेदांता जैसे बड़े औद्योगिक घरानों के अंधाधुंध विस्तार से कौन बचाएगा? उद्योगों से जुड़े भारी वाहनों के कारण सड़क दुर्घटनाओं में भी हर साल हजारों जानें जा रही हैं।
आदिवासी, दलित, किसान, मज़दूर, गरीब और पिछड़ा समाज ही नहीं—पढ़े-लिखे वकील, डॉक्टर, इंजीनियर, कर्मचारी, अधिकारी, न्यायपालिका, नेता और व्यापारी वर्ग भी मानो मौन धारण किए हुए है। यही चुप्पी जल-जंगल-ज़मीन की लूट को और गहरा रही है।
यह सिर्फ़ पर्यावरण का सवाल नहीं, यह जीवन और मृत्यु का सवाल है।
सवाल अब भी कायम है—कब रुकेगी यह मौत और कौन रोकेगा?
— जयंत बहिदार
(सामाजिक कार्यकर्ता)