Latest News

जब आधुनिक चिकित्सा भी मौन हो जाए… तब सतपुड़ा की गोद में जलती है उम्मीद की आख़िरी लौ — कान्हावाड़ी आज भी कैंसर पीड़ितों का भरोसा

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

कभी-कभी खबरें सिर्फ सूचना नहीं होतीं, वे समाज की सामूहिक आस्था, हताशा और उम्मीद—तीनों को एक साथ बयान करती हैं। मध्य प्रदेश के बैतूल जिले का छोटा सा गांव कान्हावाड़ी ऐसी ही एक कहानी है, जो दशकों से समय, तर्क और आधुनिक चिकित्सा की सीमाओं को चुनौती देती आ रही है।

साल 2026 में, जब बड़े शहरों के सुपर-स्पेशियलिटी अस्पतालों में इलाज लाखों में पहुंच चुका है, तब भी सतपुड़ा की वादियों में बसा यह गांव उन लोगों की आख़िरी उम्मीद बना हुआ है—जिन्हें डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, या जिनके लिए इलाज अब सिर्फ एक सपना रह गया।


जहाँ हाथ खड़े हुए, वहाँ हाथ थामे वैद्य बाबूलाल

घोड़ाडोंगरी ब्लॉक के कान्हावाड़ी गांव की पहचान किसी इमारत, सड़क या योजना से नहीं, बल्कि एक नाम से है—वैद्य बाबूलाल।
यह कोई आज की कहानी नहीं है। वर्षों पहले शुरू हुई यह परंपरा आज भी बिना किसी दिखावे, प्रचार या शुल्क के जारी है।

वैद्य बाबूलाल न तो बड़े मंचों पर दिखते हैं, न ही किसी विज्ञापन में। जंगलों से जुटाई गई जड़ी-बूटियाँ, वर्षों का अनुभव और नाड़ी देखकर रोग पहचानने की पारंपरिक विद्या—यही उनका इलाज है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब इलाज इतना “चर्चित” है, तो शुल्क कितना?
उत्तर—शून्य।
न दवा के पैसे, न परामर्श की फीस। शायद इसी निस्वार्थ भाव ने उन्हें मरीजों की नजर में वैद्य से “मसीहा” बना दिया है।


2026 की कान्हावाड़ी: आस्था का बढ़ता कारवां

समय बदला है, लेकिन कान्हावाड़ी की तस्वीर नहीं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब भीड़ पहले से ज्यादा है।
आज यहां सिर्फ मध्य प्रदेश ही नहीं, बल्कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और यहां तक कि विदेशों से भी लोग पहुंच रहे हैं।

इलाज की प्रक्रिया आज भी वही है—

रविवार और मंगलवार को दवा वितरण

नंबर के लिए एक-दो दिन पहले से कतार

गांव में अस्थायी ठहराव, खुले आसमान के नीचे इंतजार


लोग इसे अंधविश्वास कहें या आस्था—लेकिन हकीकत यह है कि जब विकल्प खत्म हो जाते हैं, तब इंसान उम्मीद की उस किरण की ओर जरूर देखता है, जो अब भी जल रही हो।


इलाज नहीं, अनुशासन है असली परीक्षा

वैद्य बाबूलाल का इलाज सिर्फ औषधि तक सीमित नहीं है। वे साफ शब्दों में कहते हैं—

> “दवा तभी काम करेगी, जब शरीर भी उसका साथ दे।”


इलाज के दौरान कड़ा परहेज अनिवार्य है—

मांस और मदिरा पूर्णतः वर्जित

कुछ सब्जियां और खाद्य पदार्थ निषिद्ध

अनुशासित दिनचर्या जरूरी


कई मरीजों का दावा है कि जिन्होंने नियमों का सख्ती से पालन किया, उनमें सुधार दिखा।
यही अनुभव, यही किस्से कान्हावाड़ी की प्रतिष्ठा को आज भी जीवित रखे हुए हैं।


कान्हावाड़ी कैसे पहुँचें

जिला: बैतूल (मध्य प्रदेश)

दूरी: बैतूल से लगभग 35 किमी

तहसील: घोड़ाडोंगरी (रेलवे स्टेशन व बस सुविधा उपलब्ध)

गांव: घोड़ाडोंगरी से मात्र 3 किमी

सलाह: दवा के दिन से एक रात पहले पहुंचना बेहतर



एक ज़रूरी और जिम्मेदार अपील

यह रिपोर्ट किसी दावे या चमत्कार की पुष्टि नहीं करती।
कैंसर एक गंभीर, जटिल और जानलेवा बीमारी है।

कान्हावाड़ी को लेकर लोगों की आस्था, अनुभव और विश्वास अपनी जगह है, लेकिन हमारा यह स्पष्ट मानना है कि—
किसी भी पारंपरिक उपचार को अपनाने से पहले विशेषज्ञ ऑन्कोलॉजिस्ट की सलाह अनिवार्य है।
आधुनिक चिकित्सा और पारंपरिक ज्ञान के बीच संतुलन ही सबसे सुरक्षित रास्ता हो सकता है।


कान्हावाड़ी कोई अस्पताल नहीं, बल्कि उम्मीद की वह ज़मीन है—
जहाँ विज्ञान के साथ-साथ विश्वास भी इलाज का हिस्सा बन जाता है।
और शायद इसी कारण, 2026 में भी सतपुड़ा की इन पहाड़ियों की ओर लोगों की राह थमती नहीं।

Amar Chouhan

AmarKhabar.com एक हिन्दी न्यूज़ पोर्टल है, इस पोर्टल पर राजनैतिक, मनोरंजन, खेल-कूद, देश विदेश, एवं लोकल खबरों को प्रकाशित किया जाता है। छत्तीसगढ़ सहित आस पास की खबरों को पढ़ने के लिए हमारे न्यूज़ पोर्टल पर प्रतिदिन विजिट करें।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button