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जंगल के भीतर कोयले की काली खुदाई: रायगढ़ में माफिया का उभार, सवालों के घेरे में सिस्टम और सैटेलाइट निगरानी

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़ अब उस मोड़ पर खड़ा दिख रहा है, जहां झारखंड और पश्चिम बंगाल की कुख्यात कोयला पट्टियों की परछाईं साफ नज़र आने लगी है। धरमजयगढ़, घरघोड़ा और तमनार के घने, दुर्गम और अब तक विधिवत अनएक्सप्लोर्ड माने जाने वाले इलाकों में जिस बेखौफ तरीके से पोकलेन और जेसीबी के ज़रिये कोयले की खुदाई हो रही थी, उसने न सिर्फ खनिज विभाग बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

धरमजयगढ़ के बोरो क्षेत्र में जंगल से सटे इलाके में हुई कार्रवाई महज़ एक मशीन और 50 टन कोयले की बरामदगी भर नहीं है। यह उस पूरे नेटवर्क की झलक है, जो चंद मीटर की खुदाई में निकल आने वाले कोल सीम का फायदा उठाकर, सरकारी आवंटन और पर्यावरणीय स्वीकृतियों से पहले ही धरती का सीना छलनी कर रहा है। जहां ओवरबर्डन की मोटाई बेहद कम है, वहां भारी मशीनें रात-दिन बेधड़क चल रही थीं—और हैरानी की बात यह कि यह सब “सुने” इलाकों में नहीं, बल्कि ऐसी जगहों पर हो रहा था जहां निगरानी तंत्र के सक्रिय होने के दावे किए जाते रहे हैं।

संयुक्त जांच टीम द्वारा पोकलेन की जब्ती और खनिज विभाग में प्रकरण दर्ज होना प्रशासनिक कार्रवाई का शुरुआती कदम ज़रूर है, लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है। अगर खनन कई दिनों से चल रहा था, ट्रेलरों के ज़रिये कोयला प्लांटों तक पहुंचाया जा रहा था, तो क्या यह सब किसी की नज़र से छिपा रह सकता है? किसके संरक्षण में जंगल के भीतर मशीनें उतरीं, रास्ते बने और कोयला बाहर गया?

सरकार और विभाग अक्सर सैटेलाइट कैमरों, ड्रोन सर्वे और डिजिटल मॉनिटरिंग की बात करते रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि उस निगरानी का क्या हुआ? क्या सैटेलाइट तस्वीरों में जंगल के भीतर बनते गड्ढे, खनन के निशान और मशीनों की गतिविधि दर्ज नहीं हुई? या फिर सिस्टम ने देखा, समझा और चुप रहना बेहतर समझा?

पुलिस के सामने अब सिर्फ मशीन जब्त करने या एफआईआर दर्ज करने की चुनौती नहीं है। असली परीक्षा यह है कि क्या वह इस अवैध खनन के पीछे खड़े प्रशासनिक और राजनीतिक संरक्षकों तक पहुंच पाएगी। क्या ट्रेलर मालिकों, प्लांटों में खरीद करने वालों और स्थानीय स्तर पर “सेटिंग” कराने वालों की परतें खोली जाएंगी, या मामला कुछ दिनों बाद फाइलों में दबकर रह जाएगा?

रायगढ़ का यह इलाका आने वाले समय में विधिवत आवंटन के बाद बड़े पैमाने पर कोयला उत्पादन का केंद्र बनने वाला है। ऐसे में अभी से माफिया की सक्रियता यह संकेत दे रही है कि अगर समय रहते सख्त और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई, तो अवैध खनन की यह आग और भड़क सकती है। सवाल सिर्फ 50 टन कोयले का नहीं है—सवाल उस व्यवस्था का है, जो सब कुछ होते हुए भी अनजान बनी रही।

Amar Chouhan

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