जंगल की खामोशी में एक और मौत: शावक हाथी की मौत ने वन प्रबंधन पर खड़े किए सवाल

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
तमनार, 21 फरवरी 2026। आरक्षित वन क्षेत्र के भीतर एक मादा शावक हाथी का शव मिलना केवल एक घटना नहीं, बल्कि जंगल प्रबंधन की वास्तविक स्थिति का आईना बनकर सामने आया है। तमनार रेंज के झींगोल परिसर अंतर्गत कक्ष क्रमांक 838 में शनिवार दोपहर लगभग दो बजे मिली इस सूचना ने वन अमले को सक्रिय तो किया, लेकिन इसके साथ ही कई असहज सवाल भी छोड़ दिए।
सूचना मिलते ही उपवनमंडलाधिकारी घरघोड़ा आशुतोष मंडावा, परिक्षेत्र अधिकारी विक्रांत कुमार और वन विभाग की टीम मौके पर पहुंची। घटनास्थल के आसपास हाथियों के ताजा पदचिह्न, मल-मूत्र और जमीन पर खरोंच के निशान यह बताते हैं कि शावक अपने झुंड के साथ था और अन्य हाथियों ने उसे उठाने या हिलाने की कोशिश भी की। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए असहज करने वाला है — जंगल के भीतर एक असहाय जीवन का अंत और उसके आसपास मंडराती बेबसी।
वन विभाग की प्रारंभिक जांच में किसी अवैध गतिविधि के प्रमाण नहीं मिले और पशु चिकित्सकों ने शुरुआती तौर पर मौत को कमजोरी या प्राकृतिक कारणों से जोड़कर देखा है। वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में पोस्टमार्टम भी कराया गया, लेकिन अंतिम कारण अब लैब रिपोर्ट पर टिका है। उपवनमंडलाधिकारी का कहना है कि विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी और फिलहाल क्षेत्र में गश्त बढ़ा दी गई है।
लेकिन यहीं से बहस शुरू होती है। सवाल यह नहीं कि मौत कैसे हुई — सवाल यह है कि ऐसी स्थितियां बार-बार क्यों बन रही हैं। हाथियों के पारंपरिक मार्ग सिकुड़ रहे हैं, जंगल का दबाव बढ़ रहा है और मानव गतिविधियां वन्य जीवन की स्वाभाविक गति को लगातार प्रभावित कर रही हैं। परिणामस्वरूप शावक, बूढ़े और कमजोर जानवर सबसे पहले संकट में आते हैं।
वन विभाग की भूमिका कागजों में स्पष्ट है — वन्य जीवों, पेड़-पौधों और पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा। लेकिन जमीनी तस्वीर अक्सर अलग दिखाई देती है। कई क्षेत्रों में नियमित निगरानी, भोजन और जल स्रोतों की उपलब्धता तथा हाथियों की आवाजाही के वैज्ञानिक प्रबंधन को लेकर सवाल उठते रहे हैं। जब लगातार जंगली जानवरों की मौत की खबरें सामने आती हैं और दूसरी ओर जंगल कटने की घटनाएं चर्चा में रहती हैं, तो विभागीय जवाबदेही स्वाभाविक रूप से कठघरे में आ जाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वन्य जीवों की मौत को केवल प्राकृतिक कारण कहकर आगे बढ़ जाना समाधान नहीं है। जंगलों में संसाधनों की कमी, आवास का विखंडन और मानव-वन्य संघर्ष के बढ़ते दायरे की गहराई से समीक्षा जरूरी है। खासकर हाथियों जैसे संवेदनशील और सामाजिक जीवों के मामले में निगरानी की निरंतर व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
राजधानी रायपुर से लेकर दूरस्थ वन क्षेत्रों तक संरक्षण की नीतियां बनती जरूर हैं, लेकिन उनकी प्रभावशीलता जमीन पर दिखनी चाहिए। झींगोल परिसर की यह घटना एक बार फिर याद दिलाती है कि संरक्षण केवल रिपोर्ट, गश्त और पोस्टमार्टम तक सीमित नहीं हो सकता; इसके लिए दीर्घकालिक योजना, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और कठोर निगरानी जरूरी है।
जंगल की खामोशी में हुई इस मौत ने एक बार फिर वह प्रश्न दोहरा दिया है — क्या हम केवल घटनाओं पर प्रतिक्रिया देने वाली व्यवस्था बनकर रह गए हैं, या सचमुच उस प्रकृति की रक्षा के लिए तैयार हैं, जिसकी जिम्मेदारी हमने खुद ली है।