जंगलों में कानून बेबस! घरघोड़ा में ‘पिकनिक’ की ओट में जुए का संगठित साम्राज्य, लाखों का खेल—पुलिस मौन!?

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम
घरघोड़ा (रायगढ़)।
प्रदेश में कड़ाके की ठंड ने आम जनजीवन को ठिठुरा दिया है। तापमान 8 से 10 डिग्री तक लुढ़क चुका है, लेकिन घरघोड़ा थाना क्षेत्र के जंगलों में जुआरियों की “गर्मी” चरम पर है। जहां लोग अलाव और कंबलों में सिमटे हैं, वहीं जंगलों के भीतर खुले आसमान के नीचे जुए की ऐसी ‘महाभारत’ चल रही है, जिसने कानून-व्यवस्था को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है।
सूत्रों के मुताबिक, घरघोड़ा थाना क्षेत्र के घने जंगलों में पिकनिक की आड़ में रोजाना लाखों रुपये का अवैध जुआ खिलाया जा रहा है। 52 पत्ती और खुडखुडिया चौसर पर दांव इतने बड़े लगाए जा रहे हैं कि यह महज शौकिया जुआ नहीं, बल्कि संगठित अपराध का रूप ले चुका है। हैरानी की बात यह है कि यह सब दिन के उजाले में—सुबह 11 बजे से लेकर शाम 7-8 बजे तक—धड़ल्ले से चल रहा है।

जंगलों को जोन में बांटकर चल रहा जुए का नेटवर्क
जानकारी के अनुसार, जुआरियों ने पूरे इलाके को सिंडिकेट की तरह बांट रखा है। कोनपारा से लेकर चिमटापानी, रुमकेरा, रायकेरा, सल्हेपाली, पोरड़ा, नवापारा टेंडा और कुडुमकेला तक अलग-अलग जंगलों में फड़ सजे रहते हैं। हर फड़ पर निगरानी, वसूली और सुरक्षा के लिए बाकायदा लोग तैनात रहते हैं, ताकि किसी बाहरी व्यक्ति या कार्रवाई की भनक पहले ही मिल जाए।

नाम सामने, कार्रवाई नदारद
स्थानीय स्तर पर जुआ खिलवाने वालों में महात्मा, संकीर्तन, अन्नू, जग्गू, गजनी और आनंद जैसे नाम खुलकर सामने आ रहे हैं। आरोप है कि इन्हें पुलिस के कुछ कथित नुमाइंदों का संरक्षण हासिल है। इतना ही नहीं, कुछ सफेदपोश नेताओं की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं, जो पर्दे के पीछे रहकर इस अवैध कारोबार को हवा दे रहे हैं।
ग्रामीणों में दहशत, पुलिस पर सवाल
जंगलों में दिनदहाड़े संदिग्ध आवाजाही और जमघट से आसपास के गांवों में भय का माहौल है। ग्रामीणों का कहना है कि जब सब कुछ खुली आंखों से दिख रहा है, तो पुलिस की नजरें क्यों नहीं पहुंच रहीं? छोटी-मोटी कार्रवाइयों से आंकड़े जरूर पूरे हो रहे हैं, लेकिन बड़े फड़ों पर हाथ डालने से परहेज संरक्षण के आरोपों को और पुख्ता कर रहा है।

अब जिम्मेदारी तय होगी या नहीं?
यह सवाल अब सिर्फ ग्रामीणों का नहीं रहा। जब इलाके में खुलेआम जुए का संगठित नेटवर्क सक्रिय हो, लाखों का लेन-देन रोजाना हो और नाम तक सामने हों—तो मौन भी संदेह को जन्म देता है।
क्या वरिष्ठ अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर तत्काल सख्त कार्रवाई करेंगे?
या फिर ठंड के मौसम में भी जंगलों में जुए की यह आग यूं ही धधकती रहेगी?
अब निगाहें पुलिस अधीक्षक और जिला प्रशासन पर टिकी हैं।
क्योंकि अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो सवाल सिर्फ जुए का नहीं—कानून की साख का होगा।
डेस्क रिपोर्ट