छत्तीसगढ़ में असंतोष का उबाल: कर्मचारियों ने थामा ‘कलम बंद’ का रास्ता, तीन दिन ठप रहेगा सरकारी तंत्र
फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम रायपुर।
छत्तीसगढ़ में सरकारी महकमे सोमवार से असहज खामोशी में डूब गए। फाइलें मेजों पर हैं, लेकिन कलम थमी हुई है। छत्तीसगढ़ कर्मचारी-अधिकारी फेडरेशन ने अपनी लंबित मांगों को लेकर आज से प्रदेशव्यापी ‘काम बंद–कलम बंद’ आंदोलन की शुरुआत कर दी है। यह आंदोलन 31 दिसंबर तक चलेगा, जिससे सामान्य प्रशासनिक कामकाज पर सीधा असर पड़ना तय माना जा रहा है।
फेडरेशन का कहना है कि बीते कई महीनों से कर्मचारी अपनी मांगों को लेकर शासन के दरवाजे खटखटा रहे हैं। ज्ञापन सौंपे गए, प्रतिनिधिमंडल मिले, बातचीत हुई—लेकिन हर बार आश्वासन के आगे बात नहीं बढ़ सकी। इसी उपेक्षा ने अब कर्मचारियों को आंदोलन के रास्ते पर खड़ा कर दिया है।
कर्मचारी संगठनों के अनुसार, यह आंदोलन 11 सूत्रीय मांगों को लेकर है, जिनमें वेतन विसंगति, भत्तों का भुगतान, सेवा शर्तों में सुधार और लंबित निर्णयों को लागू करने जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। फेडरेशन के पदाधिकारियों का साफ कहना है कि यह आंदोलन किसी टकराव की राजनीति नहीं, बल्कि लंबे समय से लंबित अधिकारों की मांग का परिणाम है।
आंदोलन को प्रभावी बनाने के लिए विभागों में टेबल-टू-टेबल संपर्क अभियान चलाया जा रहा है। कर्मचारियों से व्यक्तिगत तौर पर अपील की जा रही है कि वे एकजुट होकर आंदोलन में शामिल हों। इसी बीच राजपत्रित अधिकारी संघ ने भी आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है, जिससे सरकार पर दबाव और बढ़ता दिख रहा है।
हालांकि कर्मचारी संगठन यह भी दावा कर रहे हैं कि आम जनता को असुविधा न हो, इसका ध्यान रखा जाएगा। आवश्यक सेवाओं को आंदोलन से अलग रखने की बात कही गई है, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कई दफ्तरों में कामकाज की रफ्तार बेहद सुस्त हो गई है।
फेडरेशन ने चेतावनी दी है कि यदि तय समयसीमा के भीतर मांगों पर कोई ठोस और लिखित निर्णय नहीं आया, तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। संकेत साफ हैं—यह सिर्फ तीन दिनों की नाराजगी नहीं, बल्कि सरकारी तंत्र के भीतर पनपते असंतोष की गहरी तस्वीर है।
अब निगाहें सरकार पर टिकी हैं। सवाल यही है कि क्या नए साल से पहले कोई समाधान निकलता है, या फिर छत्तीसगढ़ की नौकरशाही में यह ठहराव और लंबा खिंचेगा।