घरघोड़ा में ‘राख का खेल’: नियमों की धज्जियां, रसूख का राज और किसानों की जमीन पर जहर

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़/घरघोड़ा।
राजधानी के वातानुकूलित कमरों में बनते नियम अक्सर कागजों की शोभा बढ़ाते हैं, लेकिन जब इन्हीं नियमों की कसौटी गांव-कस्बों की जमीन पर होती है, तो सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है। घरघोड़ा ब्लॉक के नावापारा-टेड़ा से सामने आया मामला इस खाई को साफ तौर पर उजागर करता है, जहां नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के निर्देशों को खुलेआम चुनौती देते हुए फ्लाई ऐश का निपटान किया जा रहा है।
सरकार एक ओर भूमिहीन परिवारों को शासकीय भूमि आवंटित कर उन्हें खेती से जोड़ने और आत्मनिर्भर बनाने की बात करती है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं जमीनों पर उद्योगों से जुड़े रसूखदारों की नजर पड़ चुकी है। हालात ऐसे हैं कि जहां धान की हरियाली लहलहानी चाहिए थी, वहां अब जहरीली राख के ढेर दिखाई दे रहे हैं। यह सिर्फ पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि नीति और नियत दोनों पर सवाल खड़ा करता है।

मंत्री का मॉडल एसओपी हुआ फेल
हाल ही में विधानसभा में वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने बड़े विश्वास के साथ कहा था कि फ्लाई ऐश का निपटान मॉडल एसओपी के तहत सख्ती से किया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट किया था कि वन और कृषि भूमि पर राख डालना पूरी तरह प्रतिबंधित है।
लेकिन घरघोड़ा की जमीनी तस्वीरें इन दावों को आईना दिखा रही हैं। सवाल उठता है कि क्या मंत्री के निर्देश केवल भाषण तक सीमित हैं? क्या स्थानीय प्रशासन इन निर्देशों को गंभीरता से लेने के बजाय नजरअंदाज कर रहा है?
अजब तहसीलदार, गजब पटवारी: सिस्टम की शतरंज
मामले में स्थानीय राजस्व अमले की भूमिका भी संदेह के घेरे में है।
नायब तहसीलदार का तर्क:
घरघोड़ा के नायब तहसीलदार का कहना है कि खसरा नंबर 311/4 पर पर्यावरण स्वीकृति के बाद कार्य किया जा रहा है। लेकिन मूल सवाल यह है कि क्या किसी स्वीकृति के नाम पर कृषि भूमि को बर्बाद करने की अनुमति दी जा सकती है?
पटवारी का ‘बेचारा’ अंदाज:
पटवारी लोकेश पैकरा ने स्वीकार किया कि संबंधित भूमि कृषि योग्य है और आसपास खेती भी हो रही है। हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि जांच प्रतिवेदन में ऐसा कोई कॉलम नहीं था जिसमें आसपास की खेती का उल्लेख किया जा सके।
यह तर्क अपने आप में कई सवाल खड़े करता है—क्या अब सच्चाई का निर्धारण फॉर्म के कॉलम तय करेंगे? क्या आंखों देखी हकीकत भी कागजी सीमाओं में कैद कर दी जाएगी?

जहरीली राख से किसका भला?
फ्लाई ऐश का यह अनियंत्रित निपटान न केवल जमीन की उर्वरता खत्म कर रहा है, बल्कि आसपास रहने वाले ग्रामीणों के स्वास्थ्य पर भी गंभीर असर डाल रहा है। हवा में घुलती राख धीरे-धीरे लोगों के फेफड़ों तक पहुंच रही है, जिससे भविष्य में(इस्नोंफिलिया) समेत गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है।
इस पूरे प्रकरण में साफ तौर पर रसूखदारों की पकड़, प्रशासन की ढिलाई और तकनीकी बहानों की आड़ में हो रहे खेल की झलक मिलती है। सबसे बड़ा नुकसान उन गरीब किसानों को हो रहा है, जिनके लिए यह जमीन जीवन का आधार है।
अब नजर इस बात पर टिकी है कि विधानसभा में सख्त बयान देने वाले जिम्मेदार इस मामले में क्या ठोस कार्रवाई करते हैं, या फिर यह मामला भी अन्य मामलों की तरह रसूख और मैनेजमेंट के बोझ तले दबकर रह जाएगा।
News associate PK Agrwal
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