घरघोड़ा भूमि अधिग्रहण मुआवजा प्रकरण में हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, प्रक्रिया तोड़कर घटाया गया मुआवजा रद्द

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम बिलासपुर।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने घरघोड़ा तहसील से जुड़े भूमि अधिग्रहण मुआवजा विवाद में एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने राजस्व प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सीधा सवाल खड़ा कर दिया है। माननीय न्यायमूर्ति पार्थ प्रतीम साहू की एकलपीठ ने यह स्पष्ट कर दिया कि कानून और प्रक्रिया से ऊपर कोई प्रशासनिक आदेश नहीं हो सकता, चाहे वह कलेक्टर स्तर से ही क्यों न आया हो।
यह मामला ग्राम बजरमुड़ा, घरघोड़ा निवासी सुरेश चौधरी से जुड़ा है, जिनकी भूमि का अधिग्रहण छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता, 1959 की धारा 247 के तहत किया गया था। तत्कालीन एसडीएम अशोक कुमार मारबल द्वारा 22 जनवरी 2021 को विधिवत प्रक्रिया अपनाते हुए मुआवजा निर्धारित किया गया था, जिसे न्यायालय ने अब सही और वैध माना है।
शासन के पत्र से शुरू हुई उलझन
प्रकरण में मोड़ तब आया, जब राज्य शासन के 4 जुलाई 2024 के एक पत्र में जांच समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए यह कहा गया कि मुआवजा निर्धारण में त्रुटि प्रतीत होती है। इसी पत्र के आधार पर कलेक्टर, रायगढ़ ने 25 जुलाई 2024 को अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), घरघोड़ा को मुआवजा पुनः आकलन करने के निर्देश दे दिए।
इन निर्देशों के पालन में एसडीओ (राजस्व) ने 2 दिसंबर 2024 को एक आदेश पारित कर वर्ष 2021 में तय की गई मुआवजा राशि में कटौती कर दी। यहीं से यह मामला हाईकोर्ट तक पहुंचा।
“बिना अनुमति और सुनवाई के समीक्षा नहीं”
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में जोरदार तर्क रखा गया कि छत्तीसगढ़ भूमि राजस्व संहिता की धारा 51 के तहत किसी भी पूर्व आदेश की समीक्षा से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति और प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। इस पूरे प्रकरण में न तो उच्चाधिकारी से विधिवत अनुमति ली गई और न ही भूमि स्वामी को अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया।
हाईकोर्ट ने इस दलील से सहमति जताते हुए कहा कि एसडीओ (राजस्व), कलेक्टर के अधीनस्थ अधिकारी हैं और वे बिना सक्षम प्राधिकारी की स्पष्ट अनुमति के अपने या पूर्ववर्ती अधिकारी के आदेश की समीक्षा नहीं कर सकते।
धारा 32 नहीं, धारा 51 ही रास्ता
न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी साफ कर दिया कि प्रशासन ने जिस तरह धारा 32 के अंतर्गत निहित शक्तियों का हवाला देकर मुआवजा आदेश की समीक्षा करने का प्रयास किया, वह विधिसंगत नहीं है। समीक्षा के लिए संहिता में धारा 51 के तहत स्पष्ट प्रावधान मौजूद है और उसी का पालन अनिवार्य है।
आदेश निरस्त, पर शासन के लिए रास्ता खुला
इन सभी आधारों पर हाईकोर्ट ने 2 दिसंबर 2024 को पारित एसडीओ (राजस्व) के आदेश को निरस्त कर दिया। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि शासन चाहे तो वह धारा 51 के तहत निर्धारित पूरी विधिक प्रक्रिया का पालन करते हुए, सक्षम प्राधिकारी की अनुमति और प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर देकर मुआवजा आदेश की समीक्षा कर सकता है।
राजस्व प्रशासन के लिए नजीर
कानूनी जानकारों की मानें तो यह फैसला केवल एक व्यक्ति के मुआवजे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राजस्व मामलों में प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय और कानून के शासन को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर स्थापित करता है। अदालत का संदेश साफ है—
प्रशासनिक जल्दबाजी या आदेशों के दबाव में कानून की अनदेखी नहीं की जा सकती।
इस फैसले के बाद घरघोड़ा सहित पूरे जिले में भूमि अधिग्रहण से जुड़े अन्य मामलों पर भी इसका असर पड़ना तय माना जा रहा है।
उक्त प्रकरण में पुर्व एसडीएम अशोक कुमार मारबल द्वारा 22 जनवरी 2021 को निर्धारित मुआवजा को सही माना गया है।