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लाठियों, जेल और उम्र से बेपरवाह संघर्ष: ठाकुर राम गुलाम और छत्तीसगढ़ के जनआंदोलनों की नई एकजुटता

Thakur Ram Gulam

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम

छत्तीसगढ़ के जनसंघर्षों के इतिहास में कुछ नाम सिर्फ दर्ज नहीं होते, वे समय की छाती पर अपनी कहानी खुद लिखते हैं। ठाकुर राम गुलाम ऐसा ही एक नाम है। सत्ता की लाठियां, जेल की सलाखें और उम्र की सीमाएं—इन तीनों को उन्होंने वर्षों पहले ही अपने संघर्ष के सामने बौना साबित कर दिया। 78 वर्ष की उम्र में भी उनका कदम उतना ही दृढ़ है, जितना उस दौर में था जब उन्होंने पहली बार अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई थी। अब तक 54 बार जेल जाना उनके लिए कोई आंकड़ा नहीं, बल्कि उस कीमत का प्रमाण है, जो उन्होंने जनता के हक में चुकाई है।

29 दिसंबर को दीपका के एसईसीएल प्रभावित क्षेत्र में हुई बैठक को साधारण सभा कहना इस ऐतिहासिक क्षण को कम आंकना होगा। यहां छत्तीसगढ़ के अलग-अलग इलाकों में जल, जंगल, जमीन, विस्थापन और आदिवासी अधिकारों को लेकर चल रहे संघर्षों को एक साझा दिशा देने का फैसला हुआ। वर्षों से बिखरे आंदोलनों को एक मंच पर लाने की पहल करते हुए यह तय किया गया कि आगे यह संघर्ष “छत्तीसगढ़ जनआंदोलन” के नाम से आगे बढ़ेगा।

बिखरे संघर्ष, एक साझा मंच

बैठक में यह साफ संदेश उभरा कि अलग-अलग मोर्चों पर लड़ते हुए आंदोलनों की ताकत सीमित रह जाती है, जबकि एकजुटता ही सत्ता और कॉर्पोरेट गठजोड़ के खिलाफ निर्णायक चुनौती बन सकती है। इसी सोच के तहत प्रदेशभर में निरंतर दौरे करने, गांव-गांव जाकर संवाद स्थापित करने और जनआंदोलनों को मजबूत करने की रणनीति तय की गई। मकसद साफ है—जल, जंगल और जमीन की लड़ाई को एक साझा आवाज़ देना।

संघर्ष, जो कभी रुका नहीं

छत्तीसगढ़ क्रांतिसेना के संयोजक ठाकुर राम गुलाम दशकों से आदिवासी समाज, किसानों और विस्थापितों की लड़ाई की अगुवाई करते रहे हैं। खनन परियोजनाओं से उजड़ते गांव हों या औद्योगिक विकास के नाम पर छीनी जा रही जमीन—उन्होंने हर मोर्चे पर सत्ता से सीधी टक्कर ली। हर गिरफ्तारी, हर मुकदमा और हर जेल यात्रा ने उन्हें कमजोर नहीं किया, बल्कि उनके संघर्ष को और धार दी।

उनके साथी कहते हैं कि जेल उनके लिए सजा नहीं, बल्कि जनसंघर्ष का सम्मान बन चुकी है। जब-जब उन्हें सलाखों के पीछे भेजा गया, तब-तब उनकी आवाज़ और दूर तक पहुंची।

सरकारें बदलीं, संघर्ष नहीं

समय के साथ सरकारें बदलीं, नीतियों के चेहरे बदले, लेकिन ठाकुर राम गुलाम का सवाल वही रहा—जनता का हक और उसकी गरिमा। सड़क से लेकर सदन तक, हर मंच पर उन्होंने आम लोगों की आवाज़ को मजबूती से रखा। आज वे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के जनआंदोलनों की जीवित चेतना बन चुके हैं।

आने वाली पीढ़ियों के लिए संदेश

ठाकुर राम गुलाम का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्पष्ट संदेश छोड़ता है—संघर्ष की राह आसान नहीं होती, लेकिन बदलाव की असली ताकत इसी राह से निकलती है। उम्र, दमन और डर जब संकल्प के सामने हार मान लें, तब इतिहास केवल लिखा नहीं जाता, जिया जाता है। छत्तीसगढ़ का जनसंघर्ष आज उसी जीवंत इतिहास का साक्षी बन रहा है।

Amar Chouhan

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