गोल्डन ऑवर में जिंदगी की गारंटी: रायगढ़ में सड़क हादसा पीड़ितों को 1.5 लाख तक कैशलेस इलाज

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़, 14 फरवरी 2026।
सड़क हादसों में हर मिनट की कीमत जान से चुकानी पड़ती है। अक्सर देखा गया है कि दुर्घटना के बाद शुरुआती एक घंटे—जिसे चिकित्सकीय भाषा में ‘गोल्डन ऑवर’ कहा जाता है—में समय पर इलाज न मिल पाने से स्थिति बिगड़ जाती है। अब इस संवेदनशील दौर में राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री राहत स्कीम (सड़क दुर्घटना पीड़ितों का नगदी रहित उपचार स्कीम 2025) लागू की है।
यह योजना गंभीर रूप से घायल व्यक्तियों को दुर्घटना की तारीख से अधिकतम सात दिनों तक प्रति व्यक्ति 1.5 लाख रुपये तक का कैशलेस उपचार सुनिश्चित करती है। खास बात यह है कि पीड़ित या उसके परिजन को अस्पताल के काउंटर पर भुगतान की चिंता किए बिना सीधे उपचार मिल सकेगा।
क्या है स्कीम की मूल भावना?
4 फरवरी 2025 को सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना के तहत यह योजना शुरू की गई। इसका उद्देश्य स्पष्ट है—दुर्घटना के बाद पहले एक घंटे में जीवनरक्षक चिकित्सा उपलब्ध कराकर मृत्यु दर को कम करना।
योजना के अंतर्गत किसी भी श्रेणी की सड़क पर मोटरयान के उपयोग से हुई दुर्घटना में घायल और अस्पताल में भर्ती योग्य व्यक्ति पात्र होगा। शर्त यह है कि पीड़ित को दुर्घटना के 24 घंटे के भीतर पहली बार अस्पताल में भर्ती कराया गया हो। 24 घंटे के बाद भर्ती होने वाले मामलों को इस योजना के दायरे में नहीं माना जाएगा।
1.5 लाख की सीमा, सात दिन की अवधि
योजना के तहत प्रति पीड़ित अधिकतम 1.5 लाख रुपये तक का उपचार पैकेज तय है। यह सुविधा अधिकतम सात दिनों तक उपलब्ध रहेगी। गंभीर स्थिति में आपातकालीन सेवाएं तत्काल शुरू की जाएंगी और पूरी प्रक्रिया नगदी रहित होगी।
सरकार ने इसके लिए ‘मोटरयान दुर्घटना निधि’ की स्थापना की है, जिसके दो पृथक खाते होंगे—
1. बीमाकृत वाहनों के लिए
2. अबीमाकृत वाहनों के लिए
इससे यह सुनिश्चित होगा कि किसी भी परिस्थिति में उपचार में आर्थिक अड़चन न आए।
ई-डीएआर और टीएमएस-2 पोर्टल से डिजिटल मॉनिटरिंग
दुर्घटना के बाद अस्पताल में पहुंचते ही पीड़ित का पंजीकरण किया जाएगा। संबंधित थाना 24 घंटे के भीतर दुर्घटना की जानकारी ई-डीएआर पोर्टल पर दर्ज कर एक्सीडेंट आईडी जारी करेगा। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग टीएमएस-2 पोर्टल के माध्यम से कैशलेस उपचार की प्रक्रिया आगे बढ़ाएगा।
यदि पुलिस स्वयं पीड़ित को अस्पताल लाती है तो भी तत्काल आईडी जनरेट कर उपचार प्रारंभ कराया जाएगा। पूरी प्रणाली को डिजिटल मॉनिटरिंग से जोड़ा गया है ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
समय-सीमा भी तय
योजना के क्रियान्वयन में ढिलाई न हो, इसके लिए स्पष्ट समय-सीमाएं निर्धारित की गई हैं—
अस्पताल में भर्ती की अधिकतम समय-सीमा: 24 घंटे
पुलिस द्वारा दुर्घटना की पुष्टि: 24 से 48 घंटे
मामला अन्य जिले में स्थानांतरण: 3 घंटे
अति गंभीर स्थिति में पूर्ण उपचार की प्रक्रिया: 48 घंटे
सामान्य होते तक निगरानी: 24 घंटे
इन प्रावधानों से यह स्पष्ट है कि व्यवस्था को कागजी नहीं, बल्कि व्यवहारिक बनाने की कोशिश की गई है।
शिकायत निवारण की व्यवस्था
जिला सड़क सुरक्षा समिति ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. अनिल जगत को शिकायत निवारण अधिकारी नियुक्त किया है। असंतोष की स्थिति में मामला जिला कलेक्टर तक पहुंचाया जा सकेगा।
16 फरवरी 2026 को सृजन सभाकक्ष में पुलिस एवं स्वास्थ्य अधिकारियों का संयुक्त प्रशिक्षण भी प्रस्तावित है, ताकि ई-डीएआर आईडी शीघ्र जारी कर उपचार प्रक्रिया में विलंब न हो।

रायगढ़ के पंजीकृत अस्पताल
रायगढ़ जिले में इस योजना के अंतर्गत 23 निजी अस्पतालों के साथ सभी एबी पीएम-जेएवाई से संबद्ध शासकीय अस्पताल पंजीकृत किए गए हैं। इनमें प्रमुख हैं—
जेएमजी मॉर्निंग स्टार हॉस्पिटल
ओपी जिंदल हॉस्पिटल
डॉ. आर.एल. हॉस्पिटल
रायगढ़ मेट्रो केयर हॉस्पिटल
अपेक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल
संजीवनी नर्सिंग होम
राजप्रिय हॉस्पिटल
सिद्धेश्वरी हॉस्पिटल
शिव हॉस्पिटल एंड डायग्नोस्टिक सेंटर
रायगढ़ ऑर्थो एवं जनरल हॉस्पिटल
पद्मावती हॉस्पिटल
डॉ. आर. पटेल यूरोलॉजी एंड मल्टी स्पेशलिस्ट
कान्हा हॉस्पिटल
श्री जनक हॉस्पिटल
उमा मेमोरियल सर्जिकल नर्सिंग होम
हरिकमल संजीवनी हेल्थ केयर
लोकेश हॉस्पिटल
अंकूल हॉस्पिटल
ग्लोबल हॉस्पिटल
गुरुदेव हॉस्पिटल
मां अंबे नर्सिंग होम
गंगा स्मार्ट हॉस्पिटल
गंगा नर्सिंग होम
मानवीय दृष्टिकोण से बड़ा कदम
यह योजना केवल आर्थिक राहत नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता का संकेत है। सड़क हादसों में अक्सर परिवार आर्थिक संकट में घिर जाता है। ऐसे में 1.5 लाख रुपये तक का त्वरित कैशलेस उपचार न केवल जीवन बचा सकता है, बल्कि परिवार को कर्ज के बोझ से भी बचाएगा।
यदि क्रियान्वयन तय मानकों पर हुआ, तो रायगढ़ में सड़क दुर्घटना के बाद “पहले भुगतान या पहले इलाज” जैसी दुविधा अतीत की बात हो सकती है। अब असली परीक्षा व्यवस्था की तत्परता और अस्पतालों की जवाबदेही की होगी।