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गेरवानी में शांभवी इस्पात के विस्तार पर 21 अप्रैल को जनसुनवाई, पर्यावरणीय प्रभावों पर टिकी निगाहें

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़। औद्योगिक विस्तार और पर्यावरणीय संतुलन के बीच संतुलन साधने की चुनौती एक बार फिर गेरवानी क्षेत्र में सामने है। शांभवी इस्पात प्राइवेट लिमिटेड (पूर्व में शाम्भवी इस्पात) द्वारा प्रस्तावित बड़े विस्तार प्रोजेक्ट को लेकर 21 अप्रैल 2026 को गेरवानी में जनसुनवाई आयोजित की जाएगी। यह जनसुनवाई छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल के तत्वावधान में होगी, जिसमें स्थानीय ग्रामीणों, जनप्रतिनिधियों और संबंधित पक्षों की राय दर्ज की जाएगी।

कंपनी ने अपने स्टील प्लांट के बैकवर्ड इंटीग्रेशन के तहत उत्पादन क्षमता बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। प्रस्तुत पर्यावरणीय समाघात निर्धारण (EIA) रिपोर्ट के कार्यपालक सार के अनुसार, परियोजना को श्रेणी ‘A’ में रखा गया है, जो इसके व्यापक प्रभाव क्षेत्र और बड़े निवेश को दर्शाता है। यह परियोजना पर्यावरण मंत्रालय की अधिसूचना के तहत शेड्यूल 3(a) (धातुकर्म उद्योग) और 1(d) (थर्मल पावर प्लांट) में शामिल है।

प्रस्तावित विस्तार में कई नई औद्योगिक इकाइयों की स्थापना शामिल है। इसमें 2 x 350 TPD क्षमता के DRI (स्पंज आयरन) किल्न लगाए जाएंगे, जिनकी कुल वार्षिक उत्पादन क्षमता लगभग 2,31,000 टन होगी। इसके साथ ही ऊर्जा दक्षता बढ़ाने के लिए 2 x 10 मेगावाट WHRB (वेस्ट हीट रिकवरी बॉयलर) पावर प्लांट तथा अतिरिक्त 1 x 10 मेगावाट FBC पावर प्लांट प्रस्तावित है।

धातु मिश्र धातुओं के उत्पादन के लिए कंपनी फेरो अलॉय इकाई स्थापित करेगी, जिसकी क्षमता 1 x 9 MVA होगी। इसके तहत FeSi (7,000 TPA), FeMn (25,200 TPA), SiMn (14,000 TPA) और FeCr (15,000 TPA) के उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। साथ ही 25,200 TPA पिग आयरन उत्पादन भी प्रस्तावित है।

परियोजना में सहायक इकाइयों के रूप में ब्रिकेटिंग प्लांट (100 किलोग्राम प्रति घंटा), ईंट निर्माण इकाई (25,000 ईंट प्रतिदिन) और स्लैग क्रशिंग यूनिट (40,000 TPA) भी शामिल हैं, जो अपशिष्ट प्रबंधन और संसाधनों के पुनः उपयोग की दिशा में कदम माने जा रहे हैं।

हालांकि, इतने बड़े औद्योगिक विस्तार के साथ पर्यावरणीय चिंताएं भी स्वाभाविक रूप से जुड़ी हैं। क्षेत्र पहले से ही औद्योगिक गतिविधियों का केंद्र रहा है, ऐसे में वायु गुणवत्ता, जल संसाधनों पर दबाव, और स्थानीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव जैसे मुद्दे जनसुनवाई के दौरान प्रमुख रूप से उठ सकते हैं।

गेरवानी और आसपास के गांवों के लिए यह जनसुनवाई महज औपचारिकता नहीं, बल्कि अपनी बात रखने का एक महत्वपूर्ण मंच होगी। स्थानीय लोगों की सहमति, आपत्तियां और सुझाव इस परियोजना के भविष्य को तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे।

अब निगाहें 21 अप्रैल पर टिकी हैं, जब यह स्पष्ट होगा कि विकास की इस रफ्तार को स्थानीय समुदाय कितना स्वीकार करता है और पर्यावरणीय सुरक्षा के लिए किन शर्तों की मांग सामने आती है।

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Amar Chouhan

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