कैंपस के सन्नाटे में टूटी एक उम्मीद: जिंदल यूनिवर्सिटी हॉस्टल में बी-टेक छात्रा की आत्महत्या, सुसाइड नोट ने खोले शिक्षा तंत्र पर सवाल

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम रायगढ़।
पूंजीपथरा स्थित ओ.पी. जिंदल यूनिवर्सिटी का परिसर शनिवार रात उस वक्त स्तब्ध रह गया, जब बी-टेक द्वितीय वर्ष की एक छात्रा ने हॉस्टल के कमरे में फांसी लगाकर जीवन समाप्त कर लिया। झारखंड के जमशेदपुर (टाटा) की रहने वाली 20 वर्षीय प्रिंसी कुमारी की मौत ने न सिर्फ उसके परिवार को तोड़कर रख दिया, बल्कि उच्च शिक्षा संस्थानों में बढ़ते शैक्षणिक दबाव और मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताया गया कि शनिवार शाम करीब 8.30 बजे परिजनों ने प्रिंसी से फोन पर संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन कई बार कॉल करने के बावजूद कोई जवाब नहीं मिला। आशंकित परिजनों ने तुरंत हॉस्टल प्रशासन को सूचना दी। वार्डन जब छात्रा के कमरे तक पहुंचीं, तो दरवाजा भीतर से बंद मिला। काफी देर तक आवाज देने के बाद भी प्रतिक्रिया नहीं मिली। अंततः खिड़की से झांककर देखने पर जो दृश्य सामने आया, उसने सभी को झकझोर दिया—प्रिंसी का शव फंदे से लटका हुआ था।
सूचना मिलते ही पूंजीपथरा थाना प्रभारी राकेश मिश्रा पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। तहसीलदार की मौजूदगी में पंचनामा कार्रवाई पूरी की गई। रविवार सुबह घरघोड़ा अस्पताल में पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया। पुलिस ने मर्ग कायम कर मामले की जांच शुरू कर दी है।

सुसाइड नोट ने बयां की भीतर की पीड़ा
कमरे से बरामद सुसाइड नोट ने छात्रा के मन में चल रहे गहरे संघर्ष की झलक दी है। नोट में प्रिंसी ने अपने माता-पिता से माफी मांगते हुए लिखा कि वह उनकी उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी। उसने यह भी उल्लेख किया कि उसकी पढ़ाई पर परिवार की मेहनत की कमाई खर्च हो रही है और वह खुद को पढ़ाई में कमजोर मानने लगी थी। परिजनों के अनुसार, बीते कुछ महीनों में सेमेस्टर फीस के लिए प्रिंसी ने अलग-अलग किश्तों में करीब एक लाख रुपये मंगवाए थे। नोट से साफ है कि शैक्षणिक प्रदर्शन और आर्थिक दबाव के बीच वह खुद को लगातार अपराधबोध में घिरा महसूस कर रही थी।
हर पहलू से जांच का दावा
पुलिस का कहना है कि छात्रा के मोबाइल फोन, हाल के कॉल रिकॉर्ड, संदेशों और पिछले दिनों के व्यवहार की गहन जांच की जाएगी। हॉस्टल के अन्य छात्रों और वार्डन से भी पूछताछ जारी है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं किसी प्रकार का अतिरिक्त दबाव, मानसिक प्रताड़ना या अन्य कारण तो इस दुखद कदम के पीछे नहीं थे।

यह घटना एक बार फिर यह सोचने को मजबूर करती है कि क्या हमारे शैक्षणिक संस्थानों में छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए पर्याप्त संवेदनशीलता और सहयोग तंत्र मौजूद है। कक्षाओं, परीक्षाओं और फीस के आंकड़ों के बीच कहीं न कहीं एक युवा जीवन टूट गया—और पीछे रह गए सवाल, जिनके जवाब सिर्फ जांच से नहीं, बल्कि व्यवस्था में बदलाव से मिलेंगे।
समाचार सहयोगी निरंजन (विष्णु) गुप्ता