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“कागज में धान, जमीन पर अफीम: गिरदावरी का खेल या प्रशासन की मिलीभगत?”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़। लैलूंगा क्षेत्र के ग्राम नवीन घटगांव में उजागर हुई अवैध अफीम खेती ने सिर्फ एक आपराधिक घटना को सामने नहीं लाया, बल्कि राजस्व व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिन खसरा नंबरों पर खुलेआम अफीम की फसल लहलहा रही थी, उन्हीं जमीनों को सरकारी रिकॉर्ड—गिरदावरी—में धान के रूप में दर्ज किया गया। यह महज लापरवाही है या फिर सुनियोजित ‘मैनेजमेंट’, अब यही जांच का सबसे अहम बिंदु बन गया है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, खसरा नंबर 412 और 429/3 में अफीम की खेती पाई गई, जबकि दस्तावेजों में खरीफ सीजन के तहत धान की एंट्री दर्ज है। यह विरोधाभास कोई सामान्य त्रुटि नहीं माना जा सकता, क्योंकि गिरदावरी प्रक्रिया खेतों के भौतिक सत्यापन पर आधारित होती है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या पटवारी ने मौके का निरीक्षण किया था, या फिर बिना खेत देखे ही कागजों में फसल उगा दी गई?

मामला यहीं नहीं रुकता। गांव के ही एक व्यक्ति के घर से सूखी अफीम की बरामदगी यह संकेत देती है कि यह गतिविधि एक-दो दिन की नहीं, बल्कि लंबे समय से संचालित हो रही थी। यदि ऐसा है, तो राजस्व अमला, स्थानीय प्रशासन और पुलिस की संयुक्त जिम्मेदारी पर भी उंगली उठना तय है।

दरअसल, गिरदावरी केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि शासन के लिए कृषि आंकड़ों, मुआवजा, बीमा और राजस्व निर्धारण का आधार होती है। इसमें पटवारी की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है कि वह खेतों का निरीक्षण कर वास्तविक फसल दर्ज करे। इसके बाद राजस्व निरीक्षक (RI) और तहसीलदार स्तर पर इसकी निगरानी और सत्यापन की जिम्मेदारी तय होती है। सवाल यह है कि जब जमीनी हकीकत और रिकॉर्ड में इतना बड़ा अंतर है, तो क्या यह पूरी श्रृंखला अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही, या फिर कहीं न कहीं इस खेल में ‘सहमति’ भी शामिल है?

छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में इससे पहले भी ऐसे मामले सामने आते रहे हैं, जहां जमीन पर एक फसल और कागजों में दूसरी फसल दर्ज पाई गई। कहीं धान की जगह अन्य , तो कहीं खाली जमीन को भी फसलयुक्त दिखाकर सरकारी योजनाओं का लाभ लेने की कोशिशें सामने आई हैं। लेकिन घटगांव का मामला इसलिए अधिक गंभीर हो जाता है, क्योंकि यहां मामला सीधे तौर पर अवैध मादक पदार्थ की खेती से जुड़ा है।

अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि कार्रवाई केवल खेत मालिकों और आरोपियों तक सीमित रहेगी, या फिर उन जिम्मेदार अधिकारियों तक भी पहुंचेगी, जिनकी आंखों के सामने यह सब होता रहा—या जिनकी कलम से यह ‘कागजी धान’ उगाया गया।

यदि जांच निष्पक्ष होती है, तो यह मामला केवल अवैध अफीम खेती का नहीं, बल्कि पूरे राजस्व तंत्र की जवाबदेही तय करने का एक बड़ा अवसर बन सकता है। लेकिन यदि यह भी अन्य मामलों की तरह फाइलों में दब गया, तो फिर सवाल वही रहेगा—क्या छत्तीसगढ़ में कागजों की खेती ही असली खेती बन चुकी है?

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Amar Chouhan

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