“कानून से ऊपर कोई नहीं” — घरघोड़ा सेशन कोर्ट ने एसडीएम–पटवारी की जमानत खारिज की, राजस्व महकमे में हड़कंप

फ्रीलांस एडिटर अमरदीप चौहान/अमरखबर.कॉम घरघोड़ा/रायगढ़।
राजस्व अभिलेखों में हेराफेरी और करोड़ों के फर्जीवाड़े के बहुचर्चित मामले में आरोपी एसडीएम अशोक मार्बल और पटवारी परमेश्वर नेताम को अदालत से बड़ी राहत मिलने की उम्मीद थी—लेकिन सोमवार की दोपहर घरघोड़ा सेशन कोर्ट का निर्णय आते ही पूरा राजस्व अमला सकते में आ गया।
अपर सत्र न्यायाधीश अभिषेक शर्मा ने दोनों की अग्रिम जमानत याचिका सख्ती के साथ खारिज कर दी। अदालत ने स्पष्ट कर दिया—“अपराध की गंभीरता और उपलब्ध साक्ष्यों को देखते हुए ऐसे प्रभावशाली अधिकारियों को अग्रिम जमानत देना विवेचना को प्रभावित कर सकता है।”
इस फैसले ने न सिर्फ इस बहुचर्चित प्रकरण की दिशा बदल दी, बल्कि राजस्व तंत्र में वर्षों से चली आ रही “मनमानी और दादागिरी” पर भी सीधी चोट मारी है।
कोर्ट में क्या हुआ—दो घंटे की बहस, तर्कों की तलब और अंत में कड़ा आदेश
जमानत के समर्थन में एसडीएम की ओर से लंबी बहस हुई। बचाव पक्ष ने आरोपों को “ब्लैकमेलिंग” का परिणाम बताया और खुद को निर्दोष साबित करने की पुरज़ोर कोशिश की।
लेकिन पीड़ित की ओर से उपस्थित मिश्रा चेम्बर रायगढ़ के वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक कुमार मिश्रा और आशीष कुमार मिश्रा ने तमाम तर्कों को तथ्यात्मक आधार पर ध्वस्त कर दिया।
अशोक कुमार मिश्रा ने अदालत को बताया—
एसडीएम अशोक मार्बल के खिलाफ सैकड़ों करोड़ के घोटाले की फाइल EOW रायपुर में लंबित है।
आईएएस जांच में भी कई आरोप सिद्ध पाए जा चुके हैं।
रायगढ़ कलेक्टर ने स्वयं उनके खिलाफ FIR दर्ज करने का आदेश दिया था।
हाईकोर्ट तक में चुनौती दी गई याचिकाएँ खारिज हो चुकी हैं।
इसके बावजूद वर्षों तक कोई FIR दर्ज न होना बताता है कि आरोपी कितना प्रभावशाली और “सिस्टम पर हावी” है।
बचाव पक्ष के “ब्लैकमेल” वाले तर्क को कोर्ट ने खारिज कर दिया और माना कि रिकॉर्ड में “जालसाजी, धोखाधड़ी और कूटरचना” के गंभीर प्रमाण मौजूद हैं।
कैसे हुआ फर्जीवाड़ा — एक जमीन, चार खेल और पूरा सिस्टम गवाह
कोर्ट में प्रस्तुत दस्तावेजों से जो कहानी सामने आई वह किसी थ्रिलर से कम नहीं—
झिंकाबहाल की जिस जमीन को बिहारी लाल पटेल का बताकर बेचा गया, वह असल में जिंदल पावर के नाम दर्ज थी।
एसडीएम और पटवारी ने मिलकर
फर्जी नामांतरण,
जाली खसरा,
जाली ऋण पुस्तिका,
और अंततः खरीददार अशोक अग्रवाल के नाम पर फर्जी राजस्व प्रविष्टि तैयार की।
पीड़ित जब दस्तावेज लेकर तहसील–थाना के चक्कर काटता रहा, तब तक स्थानीय तंत्र “दबंग एसडीएम” के आगे खामोश रहा।
पीड़ित को तब न्याय मिला जब उसने न्यायालय की शरण ली।
कोर्ट ने कहा—ऐसे अधिकारी जमानत पर बाहर हुए तो जांच ही खत्म हो जाएगी
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट का रुख स्पष्ट था—
अपराध गंभीर
दस्तावेज पुख्ता
आरोपी प्रभावशाली
और सिस्टम पर उनका असर स्पष्ट
इसलिए अदालत ने आदेश में कहा कि अग्रिम जमानत मिलने पर पूरी जांच प्रभावित होने का खतरा निश्चित है।
इसके साथ ही एसडीएम मार्बल और पटवारी नेताम की जमानत याचिका सीधे–सीधे खारिज कर दी गई।
राजस्व अमले के लिए बड़ा संदेश—“गलत प्रविष्टि, फर्जी नामांतरण, खेल अब नहीं चलेंगे”
इस फैसले ने तहसील से लेकर जिला स्तर तक सभी राजस्व अधिकारियों की नींद उड़ाई है।
कारण साफ है—पहली बार किसी उच्च पदस्थ राजस्व अधिकारी की जमानत इस आधार पर खारिज हुई है कि:
वह प्रभावशाली है,
उसके कारण सिस्टम कई वर्षों से ठप था,
और उसके रहते जांच एजेंसी भी खुलकर काम नहीं कर सकती।
यह फैसला यह संकेत भी देता है कि—
अब फर्जी नामांतरण, जाली खसरा, गलत पंचनामा, सेटिंग-बाजारी और ‘ऊपर की दबंगई’ के नाम पर किए जाने वाले खेलों पर अदालत सीधी नजर रखेगी।
पीड़ित और उसके वकीलों ने क्या कहा?
वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक मिश्रा ने टिप्पणी की—
“यह आदेश उन अधिकारियों के लिए चेतावनी है जो खुद को कानून से ऊपर मानकर सिस्टम को मनमानी का औजार बना लेते हैं।”
पीड़ित अशोक अग्रवाल ने कहा—
“मुझे पता था कि इस मामले में न्याय सिर्फ अदालत दे सकती है। आज उसी विश्वास की जीत हुई है। यही ‘सत्यमेव जयते’ का असली अर्थ है।”
यह मामला मिसाल बनेगा
घरघोड़ा कोर्ट का यह आदेश सिर्फ एक जमानत अस्वीकार नहीं, बल्कि राजस्व विभाग को दिया गया सख्त संदेश है—
अधिकार का मतलब मनमानी नहीं
फाइलों में हेराफेरी “छोटा खेल” नहीं
और सिस्टम पर कब्जा कर लेना कानून से बचने की ढाल नहीं
अब राजस्व अधिकारी–कर्मचारी समझ लें—
फर्जीवाड़े के दिन लद रहे हैं, और अदालतों की नजर अब पहले से कहीं ज्यादा पैनी है।
समाचार सहयोगी मनोज मेहर