एनटीपीसी परियोजना पर गंभीर सवाल — बेरोजगारी भत्ते से लेकर नीति उल्लंघन तक, आंदोलन की आहट

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़।
विकास के नाम पर बड़े-बड़े सपने दिखाए जाते हैं, लेकिन जब उन सपनों की जमीन पर हकीकत उतरती है तो तस्वीर अक्सर उलट नजर आती है। रायगढ़ जिले की एनटीपीसी लारा परियोजना आज इसी विरोधाभास का सबसे बड़ा उदाहरण बनती जा रही है। स्थानीय किसान, भूमिधर और प्रभावित परिवार आज भी यह सवाल पूछ रहे हैं कि जिस विकास और रोजगार का वादा किया गया था, वह आखिर गया कहां?
लारा एसोसिएट/संघर्ष समिति से जुड़े अनिल चीकू, अरविंद कुमार प्रधान, हरिकिशन पटेल, नारायण साव, मुरली थवैत, कुक गुप्ता सहित अन्य प्रतिनिधियों ने आरोप लगाया है कि एनटीपीसी लारा परियोजना में रोजगार और बेरोजगारी भत्ते के नाम पर अरबों रुपये का खेल किया गया है। समिति का दावा है कि यह परियोजना भारत सरकार की है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में छत्तीसगढ़ शासन की नीति और स्थानीय हितों को लगातार नजरअंदाज किया गया।
बताया गया कि पुसौर विकासखंड के लारा, कांदागढ़, लोहाखान, बोड़ाझरिया, पोरोरा, अरामुड़ा, देवलसुरा, जुलंगीतार सहित अनेक गांवों की कृषि भूमि अधिग्रहित की गई। भूमि बैंक योजना के तहत रजिस्ट्री कराई गई और यह भरोसा दिलाया गया कि प्रभावितों को नियमित रोजगार, बेरोजगारी भत्ता और अन्य सुविधाएं मिलेंगी। यहां तक कि 2011 से भुगतान और रोजगार प्रक्रिया शुरू होने की बात कही गई थी तथा उद्योग की चारदीवारी भी खड़ी हो गई।

लेकिन संघर्ष समिति का आरोप है कि छत्तीसगढ़ शासन की नीति की कंडिका 11.2.3 में जो प्रावधान स्पष्ट रूप से दर्ज हैं, उनका पालन नहीं किया गया। स्थानीय लोगों के अनुसार, परियोजना से जुड़ी लारा कंसल्टेंसी का एक तिहाई हिस्सा प्रभावित किसानों और स्थानीय युवाओं के लिए निर्धारित होना था, परंतु इसे दरकिनार कर बाहरी लोगों और कथित बिचौलियों को लाभ पहुंचाया गया। आरोप यहां तक लगाए जा रहे हैं कि एनटीपीसी लारा और दिल्ली में बैठे कुछ अधिकारियों व कर्मचारियों की मिलीभगत से स्थानीय युवाओं के हक पर डाका डाला गया।
इस पूरे मामले को लेकर प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर रायगढ़ मयंक चौधरी से मुलाकात कर अपनी शिकायत दर्ज कराई है और अविलंब उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। संघर्ष समिति का कहना है कि यदि निष्पक्ष जांच होती है, तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं और प्रभावितों को न्याय मिल सकता है।
इधर, आंदोलन की भाषा भी अब और तीखी होती जा रही है। समिति का दावा है कि यह प्रदेश का सबसे लंबा चलने वाला जनआंदोलन बन चुका है और यदि मांगों पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो यह आंदोलन जिला, प्रदेश ही नहीं बल्कि देशव्यापी स्वरूप ले सकता है। रणनीति तैयार की जा चुकी है और प्रशासन, राज्य व केंद्र सरकार के समक्ष एक बार फिर संगठित होकर आवाज उठाने की तैयारी है।
कुल मिलाकर, एनटीपीसी लारा परियोजना अब केवल एक औद्योगिक योजना नहीं रह गई है, बल्कि यह स्थानीय अधिकारों, रोजगार, नीति पालन और प्रशासनिक जवाबदेही का बड़ा सवाल बन चुकी है। आने वाले दिनों में जांच और आंदोलन की दिशा तय करेगी कि यह मामला समाधान की ओर बढ़ता है या संघर्ष की नई लकीर खींचता है।