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एक भूली-बिसरी कहानी

रायगढ़ : कोयले से ऊर्जा तक, संघर्ष से सृजन तक

विशेष फीचर अमरदीप चौहान | http://amarkhabr.com

रायगढ़ — छत्तीसगढ़ का वह अंचल, जिसे अक्सर केवल औद्योगिक पहचान के दायरे में बाँध दिया जाता है, जबकि इसकी आत्मा इतिहास, आध्यात्मिकता, लोकसंस्कृति और प्रकृति की गोद में आज भी जीवित है। यह वही धरती है जहाँ छत्तीसगढ़ी सभ्यता की धड़कन सुनाई देती है, जिसे आकार देने में दानवीर स्वर्गीय सेठ किरोड़ीमल जी जैसे मनीषियों की निर्णायक भूमिका रही है।

रायगढ़ से लगभग 18 किलोमीटर दूर स्थित रामझरना केवल एक जलप्रपात नहीं, बल्कि आस्था और प्रकृति का संगम है। मान्यता है कि वनवास काल में भगवान श्रीराम ने यहाँ विश्राम किया था। वहीं कल-कल बहती केलो नदी, रायगढ़ की जीवनरेखा मानी जाती है। इसके घाटों पर उगता और ढलता सूर्य जैसे इस भूमि की साधना को नमन करता प्रतीत होता है। ऐतिहासिक रायगढ़ किला आज भी वीरता और राजपरंपरा की मौन गाथा कहता है, तो माँ पाथलगौरी मंदिर स्थानीय आस्था का केंद्र बनकर नवरात्रि में भव्य मेले का साक्षी होता है।

रायगढ़ से लगभग 30 किलोमीटर दूर खरसिया क्षेत्र अपनी ऐतिहासिक पहचान और व्यापारिक परंपरा के लिए जाना जाता है। खरसिया से 10 किलोमीटर दूर अटल गार्डन और उससे सटे बरगढ़ खोला प्राकृतिक सौंदर्य की अद्भुत मिसाल हैं। इसी क्षेत्र के डोमनारा से दक्षिण दिशा में स्थित माँ चंद्रहासिनी मंदिर (चंद्रपुर) रायगढ़ जिले का सबसे प्रसिद्ध शक्तिपीठ है, जहाँ छत्तीसगढ़ ही नहीं, उड़ीसा से भी हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। वहीं पास ही सारंगढ़ राजवंशों की धरोहर के रूप में कला, मंदिरों और लोकपरंपराओं का जीवंत केंद्र है। पूर्व दिशा में घरघोड़ा के जंगल और जलप्रपात प्रकृति प्रेमियों के लिए स्वर्ग समान हैं, तो कोड़ातराई और पुसौर के ग्रामीण अंचलों में छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति आज भी अपने मूल स्वरूप में साँस ले रही है।

इसी प्राकृतिक और सांस्कृतिक वैभव के बीच, रायगढ़ कोयलांचल के विकास की एक ऐसी कहानी दबी पड़ी है, जो संघर्ष, संकल्प और संवेदना की मिसाल है। इस कहानी के जीवित साक्षी हैं डॉ. वासुदेव यादव।

छोटे कद-काठी, सांवले रंग और भीतर उबलते जुझारूपन के साथ, झारखंड की देवभूमि बैद्यनाथ धाम के एक छोटे से गाँव की पगडंडी से निकलकर वे लगभग पचास वर्ष पहले रायगढ़ पहुँचे थे। न जेब में सिफारिश, न सिर पर सत्ता की छाया — केवल समाज के लिए कुछ कर गुजरने की बेचैनी।

मध्यप्रदेश शासन की धरती ने उन्हें पहली सरकारी नौकरी दी — कोयला खदान में। एक वर्ष बाद उनका तबादला डोमनारा कोयला खदान में हुआ। तभी एक आदेश आया —
“डोमनारा की खदान में कोयला नहीं है।”
और एक झटके में खदान बंद। सभी आदिवासी कर्मियों को राजगमार कॉलरी (कोरबा) भेज दिया गया।

पुरुष चले गए। गाँव की झोपड़ियों में सन्नाटा उतर आया। घरों में बैठी महिलाएँ और बूढ़े माता-पिता अपने जीवन के सहारे से वंचित हो गए। यह दृश्य डॉ. यादव की आत्मा को भीतर तक झकझोर गया।

उन्होंने किसी राजनीतिक दल का सहारा नहीं लिया। बस सीने में जलती आग को संजोकर एक संकल्प लिया —
“इन मजदूरों को वापस लाना है।”

तीन वर्षों तक वे कलकत्ता, बिलासपुर और दिल्ली के चक्कर लगाते रहे। न कोई चंदा, न कोई मदद। लगभग एक लाख रुपये अपनी जेब से खर्च किए — बच्चों की फीस काटकर, परिवार की जरूरतें घटाकर। लेकिन वे रुके नहीं।

और फिर वह दिन आया — जो उनके लिए दिवाली से कम नहीं था।
डोमनारा कोयला खदान फिर से खुली।
मजदूर लौटे, घरों में रौनक आई, बुझते चूल्हों में फिर आग जली।

यह सिर्फ खदान का पुनः संचालन नहीं था, बल्कि उजड़ते परिवारों को फिर से जोड़ने की कहानी थी। यहीं से कोयलांचल ने “आकार” लेना शुरू किया। डॉ. यादव के नेतृत्व में एक आंदोलन खड़ा हुआ, जिसकी परिणति में अस्तित्व में आया — एसईसीएल रायगढ़ कोयला अंचल।

जहाँ कभी कहा गया था “यहाँ कोयला नहीं है”, आज वहीं से देश की औद्योगिक धड़कन को ऊर्जा मिल रही है। सरकारी रिकॉर्ड में यह एक परियोजना है, लेकिन इस परियोजना में पसीने की महक और संघर्ष की साँसें शामिल हैं।

आज रिटायरमेंट को ग्यारह वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन डॉ. यादव वापस बैद्यनाथ धाम नहीं लौटे। कारण साफ है —
जो गरीब माता-पिता अपने बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाने का सपना देखते थे, पर आर्थिक कारणों से पूरा नहीं कर पाते थे, उनके लिए उन्होंने कृष्णा एंग्लो वैदिक पब्लिक हाई स्कूल, डोमनारा की स्थापना की। कम शुल्क में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उनका संकल्प है, ताकि यह क्षेत्र एक दिन विकास के शिखर पर पहुँचे।

शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने लेखन को भी साधना बनाया। अब तक वे तीन काव्य पुस्तकें, दो हिंदी उपन्यास, एक लघुकथा संग्रह, एक अंग्रेज़ी उपन्यास और तीन डिजिटल उपन्यास लिख चुके हैं, जिन्हें देश-विदेश में पढ़ा जा रहा है। उल्लेखनीय है कि वे छत्तीसगढ़ के पहले मोटिवेशनल इंग्लिश उपन्यासकार हैं — यह उपलब्धि उनके लिए आत्मिक संतोष का स्रोत है।

रायगढ़ की यह कहानी केवल अतीत नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक दीपस्तंभ है — जो बताती है कि जब संवेदना, संघर्ष और संकल्प साथ चलते हैं, तो कोयले की राख से भी विकास की लौ जल सकती है।

— डॉ. वासुदेव यादव
संस्थापक, कृष्णा एंग्लो वैदिक पब्लिक हाई स्कूल
डोमनारा, पोस्ट-खरसिया, जिला रायगढ़ (छत्तीसगढ़)

Amar Chouhan

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