Latest News

ऊर्जा की भट्टी में झोंका गया रायगढ़: 600 यूनिट नहीं, जीवन का अधिकार मांग रहे लोग

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com

रायगढ़। यह अब निवेदन नहीं, चेतावनी है। यह अब याचिका नहीं, हिसाब है। वर्षों से रायगढ़ की छाती चीरकर निकाला जा रहा कोयला, आसमान में छोड़ा जा रहा धुआँ और धरती से खींचा जा रहा पानी—इन सबका जोड़-घटाव अब जनता खुद कर रही है। सवाल सीधा है—अगर वर्तमान और भविष्य ही बीमारियों की भेंट चढ़ गए तो इस बिजली का करेंगे क्या?

रायगढ़ को ‘ऊर्जा राजधानी’ कहा गया। लेकिन इस चमक के पीछे स्याही किसके हिस्से आई? खेतों की नमी सूख गई, जंगलों की हरियाली राख में बदल गई, और हवा में घुली जहरीली परत ने सांस लेना तक महंगा कर दिया। जिन घरों के आंगन में कभी अनाज सूखता था, आज वहां राख की महीन धूल जमती है। बच्चों की खांसी अब मौसमी नहीं, स्थायी हो चली है। बुजुर्गों की सांस मशीनों पर टिकने लगी है।

और ऐसे में जब बिजली कंपनियां मुनाफे के आंकड़े गिना रही हैं, तब रायगढ़ के लोग पूछ रहे हैं—हमारे हिस्से का न्याय कहाँ है?

“संसाधन हमारे, हक भी हमारा”—अब नारा नहीं, संकल्प

राज्य विद्युत नियामक आयोग के समक्ष बड़ी संख्या में पहुंचे नागरिकों ने 600 यूनिट मुफ्त बिजली की मांग को राहत नहीं, प्रतिपूरक अधिकार बताया। उनका कहना है—जब जल, जंगल और जमीन हमारी है, जब प्रदूषण की मार हम झेल रहे हैं, जब दुर्घटनाओं में जान हमारे लोग गंवा रहे हैं, तो कम से कम बिजली पर तो हमारा पहला हक बनता है।

जनसुनवाई के दौरान पुलिस बल की तैनाती ने एक बात साफ कर दी—मुद्दा सिर्फ टैरिफ का नहीं, जनाक्रोश का है। लोग अब कागजों के आंकड़ों से संतुष्ट नहीं होंगे। वे यह जानना चाहते हैं कि प्रदूषण से बढ़ती बीमारियों का हिसाब कौन देगा? भूजल के गिरते स्तर का जिम्मेदार कौन है? राख से ढकी फसलों और दमघोंटू हवा का मुआवजा कौन तय करेगा?

विकास या विनाश?

सड़कें दिन-रात दौड़ते भारी वाहनों से कांप रही हैं। गांवों के पास से गुजरती कोयला लदी ट्रकें सिर्फ धूल ही नहीं उड़ातीं, वे हर दिन एक नया खतरा भी लेकर चलती हैं। दुर्घटनाओं में बढ़ती मौतें अब आंकड़े नहीं, परिवारों की त्रासदी हैं।

डॉक्टरों के अनुसार अस्थमा, एलर्जी, फेफड़ों के संक्रमण और कैंसर जैसे रोगों में इजाफा चिंताजनक है। इलाज का खर्च लाखों में पहुंचता है—और यहीं से एक परिवार की आर्थिक रीढ़ टूट जाती है। क्या यही विकास है? क्या यही औद्योगिक प्रगति की कीमत है?

“राहत नहीं, न्याय चाहिए”

रायगढ़ बचाओ-लड़ेंगे समूह और अन्य नागरिक संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है—600 यूनिट मुफ्त बिजली कोई खैरात नहीं है। यह उस नुकसान का आंशिक प्रतिपूरण है जो दशकों से झेला जा रहा है।
सवाल यह भी है कि जब उद्योगों को रियायतें दी जा सकती हैं, तो स्थानीय नागरिकों को क्यों नहीं?

यदि मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं हुआ तो यह आंदोलन व्यापक रूप ले सकता है। यह सिर्फ बिजली बिल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जल-जंगल-जमीन के दोहन की पूरी नीति पर सवाल उठाएगा।

अंतिम प्रश्न

रायगढ़ आज दो राहों पर खड़ा है—
एक राह मुनाफे की है, दूसरी जीवन की।

लोग साफ कह रहे हैं—अगर हमारी आने वाली पीढ़ियां ही सुरक्षित नहीं रहीं, अगर सांस लेना ही मुश्किल हो गया, तो बिजली की रोशनी किस काम की?

रायगढ़ अब चुप नहीं रहेगा।
अब हिसाब होगा—संसाधनों का भी और जिम्मेदारियों का भी।

Amar Chouhan

AmarKhabar.com एक हिन्दी न्यूज़ पोर्टल है, इस पोर्टल पर राजनैतिक, मनोरंजन, खेल-कूद, देश विदेश, एवं लोकल खबरों को प्रकाशित किया जाता है। छत्तीसगढ़ सहित आस पास की खबरों को पढ़ने के लिए हमारे न्यूज़ पोर्टल पर प्रतिदिन विजिट करें।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button