आर. इंस्पेक्टर एग्रीमेंट के 6 लाख डकारने के बाद रजिस्ट्री में कर रहा आनाकानी, पुलिस कप्तान से लगाई गुहार

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
खसरा, एग्रीमेंट और ‘खोट’: जब राजस्व महकमे का नाम आया जमीन सौदे की दलदल में
रायगढ़। जमीन के सौदे में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी होता है। मगर जब सौदा ही भरोसे के नाम पर हो और किरदारों में राजस्व विभाग का एक जिम्मेदार कर्मचारी शामिल हो, तो मामला सिर्फ दो पक्षों के बीच का विवाद नहीं रह जाता—यह व्यवस्था पर उठते सवालों में बदल जाता है।
जिला मुख्यालय से सटे ग्राम भेलवाटिकरा की खसरा नंबर 31, रकबा 4.977 हेक्टेयर की संयुक्त खाते की जमीन इन दिनों विवादों के घेरे में है। पार्क एवेन्यू निवासी गणेशराम अग्रवाल ने पुलिस अधीक्षक से शिकायत कर आरोप लगाया है कि जमीन के मालिक महेशराम चौहान—जो पेशे से राजस्व निरीक्षक बताए जा रहे हैं—ने पूर्व में बाकायदा लिखित एग्रीमेंट करते हुए 6 लाख रुपये बतौर अग्रिम राशि ली थी। इतना ही नहीं, खाते की जमीन की ऋण पुस्तिका भी क्रेता को सौंप दी गई, जो आज भी उसके पास सुरक्षित है।
शिकायतकर्ता का कहना है कि शुरुआती सहमति और दस्तावेजों के आदान-प्रदान के बाद अब विक्रेता पक्ष रजिस्ट्री करने में आनाकानी कर रहा है। खरीदार ने जब पहल नहीं देखी, तो पहले अखबार में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित कराई और फिर अधिवक्ता के माध्यम से लीगल नोटिस भी भेजा। इसके बावजूद रजिस्ट्री की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
सवाल सिर्फ 6 लाख का नहीं
यह प्रकरण केवल छह लाख रुपये की अग्रिम राशि का विवाद नहीं है। सवाल इस बात का है कि यदि राजस्व विभाग से जुड़े कर्मचारी ही जमीन सौदों में दलाली या व्यक्तिगत लेन-देन में सक्रिय पाए जाते हैं, तो आम नागरिक किस पर भरोसा करे? जिनके हाथ में खसरा-खतौनी, नकल और नामांतरण की प्रक्रिया है, यदि वही निजी सौदों में पक्षकार बनें, तो निष्पक्षता की धारणा स्वतः कमजोर होती है।
स्थानीय हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि हाल के वर्षों में जमीन की कीमतों में आई तेजी ने राजस्व तंत्र के आसपास ‘दलाली संस्कृति’ को बढ़ावा दिया है। हालांकि आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही होगी, परंतु इस मामले ने एक बार फिर राजस्व अमले की भूमिका पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया है।
पुलिस कप्तान से गुहार
गणेशराम अग्रवाल ने पुलिस अधीक्षक को सौंपे ज्ञापन में निष्पक्ष जांच और उचित कार्रवाई की मांग की है। अब देखना यह होगा कि पुलिस इस शिकायत को आपराधिक धोखाधड़ी के दायरे में जांचती है या इसे दीवानी प्रकृति का विवाद मानते हुए अलग दिशा देती है।
कानूनी जानकारों का कहना है कि यदि लिखित एग्रीमेंट, भुगतान के प्रमाण और ऋण पुस्तिका हस्तांतरण जैसे दस्तावेज मौजूद हैं, तो मामला गंभीरता से जांच के योग्य है।
व्यवस्था के लिए चेतावनी
रायगढ़ जैसे तेजी से विकसित होते शहर में जमीन के सौदे रोजमर्रा की बात हो गए हैं। ऐसे में यदि राजस्व विभाग से जुड़े लोगों का नाम भी विवादों में आने लगे, तो यह प्रशासनिक साख के लिए शुभ संकेत नहीं है।
यह मामला केवल एक रजिस्ट्री का नहीं—यह उस भरोसे का है, जिस पर आम नागरिक अपनी जीवनभर की कमाई दांव पर लगाता है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि जांच कितनी पारदर्शी होती है और व्यवस्था खुद को कैसे साबित करती है।
News associate Manoj mehar