“अफीम उगी, सिस्टम सोया रहा: कार्रवाई खेतों में, जिम्मेदारी दफ्तरों में क्यों दफन?”

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
रायगढ़ जिले में इन दिनों पुलिस की कार्रवाई सुर्खियों में है—अवैध अफीम की खेती पर लगातार छापेमारी, फसलों का नष्ट किया जाना और आरोपियों की गिरफ्तारी। पहली नजर में यह सख्ती नशे के खिलाफ प्रशासन की गंभीरता का संकेत देती है, लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू कहीं ज्यादा असहज करने वाला है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि अफीम कहां-कहां उग रही थी, बल्कि यह है कि आखिर यह उगी कैसे—और इतने लंबे समय तक नजरों से ओझल क्यों रही?
जिले के कई इलाकों में जिस पैमाने पर अफीम की खेती सामने आई है, वह किसी एक-दो खेतों की कहानी नहीं लगती। यह एक संगठित और लगातार चल रही गतिविधि की ओर इशारा करती है। ऐसे में जिम्मेदारी केवल उन किसानों या आरोपियों तक सीमित कर देना, जिनके खेतों में फसल मिली, क्या पर्याप्त है? या फिर यह आसान रास्ता चुनकर असली सवालों से बचने की कोशिश है?
डिजिटल क्रॉप सर्वे जैसी व्यवस्था का उद्देश्य ही यही था कि खेतों की वास्तविक स्थिति का नियमित और सटीक रिकॉर्ड तैयार हो। कागजों में यह व्यवस्था जितनी सुदृढ़ दिखाई देती है, जमीनी हकीकत उतनी ही खोखली नजर आ रही है। यदि सर्वेक्षण ईमानदारी से हुआ होता, तो क्या इतनी बड़ी मात्रा में अवैध खेती पनप पाती? या फिर सर्वे केवल फाइलों में “पूर्ण” दिखाकर जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया गया?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा अब खुलकर सामने आ रही है कि कई राजस्व कर्मचारी मुख्यालय से दूर रहकर ही कागजी खानापूर्ति करते रहे। मौके पर जाकर निरीक्षण करने की जो मूल भावना थी, वह शायद कहीं रास्ते में ही दम तोड़ गई। नतीजा यह हुआ कि खेतों में अफीम उगती रही और सिस्टम अपनी ही बनाई रिपोर्टों पर संतुष्ट बैठा रहा।

सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि जब मामला उजागर होता है, तो कार्रवाई का सारा भार निचले स्तर पर ही दिखाई देता है। खेतों में खड़ी फसलें नष्ट कर दी जाती हैं, कुछ गिरफ्तारियां हो जाती हैं और मामला मानो समाप्त। लेकिन जिनकी जिम्मेदारी निगरानी की थी, जिनके हस्ताक्षर से सर्वे “संपन्न” हुआ, उनकी भूमिका पर चुप्पी क्यों?
यह चुप्पी अब सवाल बनकर सामने खड़ी है। क्या यह केवल लापरवाही है या फिर कहीं न कहीं मिलीभगत की बू भी आ रही है? और यदि ऐसा है, तो क्या जांच की दिशा उस ओर बढ़ेगी या फिर मामला हमेशा की तरह आधा अधूरा ही रह जाएगा?
जनता के बीच अब यह भावना मजबूत हो रही है कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल दिखावटी कार्रवाई तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जब तक जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक ऐसे नेटवर्क बार-बार पनपते रहेंगे। जरूरत इस बात की है कि कार्रवाई की धार खेतों से आगे बढ़कर दफ्तरों तक पहुंचे।
रायगढ़ का यह प्रकरण एक चेतावनी भी है और अवसर भी—चेतावनी इसलिए कि सिस्टम की खामियां उजागर हो चुकी हैं, और अवसर इसलिए कि यदि ईमानदारी से जांच हो, तो व्यवस्था में सुधार की दिशा तय की जा सकती है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस चुनौती को कितनी गंभीरता से लेता है—या फिर यह मामला भी कुछ दिनों की सुर्खियों के बाद फाइलों में दबकर रह जाएगा।
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