गाइडलाइन दरों का नया गणित: औद्योगिक रायगढ़ में जमीन, मुआवजा और उम्मीदों की नई कहानी

Freelance editor Amardeep chauhan @ http://amarkhabar.com
छत्तीसगढ़ में संपत्ति मूल्यांकन की व्यवस्था एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। 20 फरवरी 2026 से लागू नई गाइडलाइन दरों ने न केवल खरीद-फरोख्त की लागत बदली है, बल्कि औद्योगिक जिलों में मुआवजे की गणना के पूरे ढांचे को भी प्रभावित किया है। विशेष रूप से रायगढ़, जहां उद्योग, खनन और बुनियादी ढांचे की परियोजनाएं लगातार जमीन की मांग बढ़ा रही हैं, वहां इस बदलाव के दूरगामी असर दिखाई देने लगे हैं।
जमीन का कागजी मूल्य और असली बाजार का अंतर
रायगढ़ लंबे समय से औद्योगिक निवेश का केंद्र रहा है। स्टील, पावर और लॉजिस्टिक्स परियोजनाओं के कारण यहां जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य कई इलाकों में गाइडलाइन दरों से काफी ऊपर चल रहा था। नई दरों का पुनरीक्षण इस अंतर को कम करने की कोशिश माना जा रहा है।
वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, जिला मूल्यांकन समितियों ने ग्रामीण पट्टियों से लेकर शहरी विस्तार क्षेत्रों तक जमीन के उपयोग, सड़क कनेक्टिविटी और औद्योगिक गतिविधियों को आधार बनाकर प्रस्ताव तैयार किए। केंद्रीय स्तर पर परीक्षण के बाद इन्हें मंजूरी मिली — जिसका सीधा असर रजिस्ट्री शुल्क और अधिग्रहण मुआवजे दोनों पर पड़ेगा।
मुआवजे का नया समीकरण
भूमि अधिग्रहण के मामलों में गाइडलाइन दरें एक आधार बनती हैं। ऐसे में दरों में वृद्धि का मतलब है कि भविष्य में होने वाले अधिग्रहणों में किसानों और जमीन मालिकों को अपेक्षाकृत अधिक मुआवजा मिल सकता है।
रायगढ़ के औद्योगिक बेल्ट — खासकर हाईवे किनारे और प्रस्तावित परियोजना क्षेत्रों — में यह बदलाव महत्वपूर्ण है।
हालांकि विशेषज्ञ एक चेतावनी भी जोड़ते हैं:
यदि बाजार मूल्य तेजी से बढ़ता रहा और गाइडलाइन दरें फिर पीछे रह गईं, तो मुआवजा विवादों की स्थिति बनी रह सकती है। इसलिए पुनरीक्षण की प्रक्रिया को नियमित बनाए रखना जरूरी होगा।
उद्योग बनाम कृषि: संतुलन की चुनौती
रायगढ़ में जमीन सिर्फ निवेश का साधन नहीं, बल्कि आजीविका का आधार भी है। नई दरों से जहां किसानों को भविष्य में बेहतर मुआवजे की उम्मीद है, वहीं उद्योगों के लिए परियोजना लागत बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
यानी विकास की रफ्तार और स्थानीय हितों के बीच संतुलन की चुनौती फिर सामने है।
स्थानीय रियल एस्टेट जानकारों का मानना है कि नई गाइडलाइन दरें औद्योगिक विस्तार को रोकेंगी नहीं, बल्कि लेन-देन को अधिक औपचारिक बनाएंगी। इससे नकद सौदों की प्रवृत्ति कम हो सकती है और राजस्व बढ़ेगा।
रजिस्ट्री कार्यालयों में बढ़ी हलचल
नई दरों के लागू होने के साथ ही पंजीयन कार्यालयों में जानकारी लेने वालों की संख्या बढ़ी है। संपत्ति खरीदने की योजना बना रहे लोग लागत का पुनर्मूल्यांकन कर रहे हैं, जबकि विक्रेता यह देख रहे हैं कि उनकी जमीन का कागजी मूल्य कितना बढ़ा।
आगे की दिशा: पारदर्शिता की परीक्षा
राज्य सरकार का दावा है कि चरणबद्ध तरीके से अन्य जिलों में भी नई दरें लागू होंगी। रायगढ़ का उदाहरण इस बात की परीक्षा बनेगा कि क्या गाइडलाइन दरें वास्तव में बाजार के करीब लाई जा सकती हैं और क्या इससे मुआवजा विवाद कम होंगे।
रायगढ़ जैसे औद्योगिक जिले में जमीन सिर्फ जमीन नहीं होती — वह निवेश, रोजगार, विस्थापन और विकास की संयुक्त कहानी होती है। नई गाइडलाइन दरें इसी कहानी का नया अध्याय हैं, जिसमें उम्मीद भी है और सवाल भी।